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Haryana GK: Medieval History of Haryana Notes PDF Download हरियाणा का मध्यकालीन इतिहास

By Ravi Yadav

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यदि आप हरियाणा सामान्य ज्ञान (Haryana GK) की तैयारी कर रहे हैं, तो “Haryana GK: Medieval History of Haryana Notes PDF Download हरियाणा का मध्यकालीन इतिहास” एक महत्वपूर्ण विषय है। हरियाणा का मध्यकालीन इतिहास विभिन्न राजवंशों, युद्धों और सांस्कृतिक विकास से जुड़ा हुआ है, जिसने राज्य की ऐतिहासिक पहचान को आकार दिया। इस विषय से संबंधित प्रश्न प्रतियोगी परीक्षाओं में अक्सर पूछे जाते हैं। इस ब्लॉग पोस्ट में हम आपको हरियाणा के मध्यकालीन इतिहास से जुड़े सरल, स्पष्ट और विस्तृत नोट्स प्रदान करेंगे, जिससे आपकी तैयारी बेहतर होगी। साथ ही, आप यहां से इन नोट्स का PDF डाउनलोड करके आसानी से त्वरित पुनरावृत्ति भी कर सकते हैं।

मध्यकालीन इतिहास

❖ हरियाणा के पूर्व मध्यकाल के इतिहास में तोमरों का महत्वपूर्ण स्थान है।
❖ तोमरों को हिन्दी साहित्य में तंवर या तुंवर कहा गया है, जबकि संस्कृत ग्रंथों और अभिलेखों में इन्हें ‘तोमर’ कहा गया है।
❖ उत्तर-पश्चिम से होने वाले तुर्कों के आक्रमणों का सामना करने के लिए हिन्दूवादी शासक जयपाल के नेतृत्व में बनाए गए ‘राजपूत संघ’ में तोमर (दिल्ली के तोमर) भी शामिल थे।
❖ भारत के मध्यकालीन इतिहास का आरम्भ भारत पर मुस्लिम आक्रमण के समय से माना जाता है।
❖ हरियाणा भारत के उत्तरी भाग में स्थित होने के कारण इन आक्रमणों से राज्य अत्यधिक प्रभावित रहा।

आरम्भिक मुस्लिम आक्रमण

❖ इन आक्रमणों की शुरुआत 1001 ई. में महमूद गजनवी के आक्रमण से हुई। उसने 1001 ई. से 1027 ई. तक 17 बार भारत पर आक्रमण किया।
❖ भारत के हरियाणा क्षेत्र (दिल्ली, हांसी सहित) पर महमूद गजनवी आक्रमण के पश्चात तोमरों को हराकर चौहानों ने अपनी सत्ता कायम की।
❖ वह भारत से धन लूटना चाहता था और साथ ही भारत में इस्लामी पताका भी फहराना चाहता था।

महमूद गजनवी का आक्रमण

❖ 1009 ई. में महमूद गजनवी ने थानेसर पर हमला किया। उस समय वहां का शासक जयपाल था।
❖ महमूद गजनवी का भारत पर यह सातवां आक्रमण तथा हरियाणा क्षेत्र पर प्रथम आक्रमण था। महमूद बिना लड़े ही नारायणगढ़ से अपनी सेना के साथ वापस चला गया।
❖ 1014 ई. में गजनवी ने थानेसर पर पुनः हमला किया। इस आक्रमण के समय थानेसर का शासक तोमर राजा जयपाल था।
❖ यह युद्ध शाहाबाद के निकट मारकण्डा नदी के तट पर हुआ। इस युद्ध में महमूद गजनवी विजयी हुआ।
❖ थानेसर पर महमूद की विजय के पश्चात भी 1021 ई. तक तोमर शासक जयपाल थानेसर पर राज्य करता रहा।
❖ तोमर शासक जयपाल की सहायता की अपील पर राजपूत शासकों में एकता नहीं बनी और वह पराजित हो गया।

❖ महमूद गजनवी ने थानेसर में भारी लूटपाट की तथा चक्रस्वामी की मूर्ति तोड़ दी।
❖ महमूद गजनवी के थानेसर पर आक्रमण के समय उसका दरबारी कवि अलबरूनी भी उसके साथ था।
❖ अलबरूनी ने अपनी रचना ‘किताब-उल-हिन्द’ में थानेसर को हिन्दुओं का महत्वपूर्ण तीर्थ बताया था।
❖ हरियाणा के बाद महमूद गजनवी ने दिल्ली पर हमला करना चाहा, किन्तु सैनिकों के विरोध के कारण उसे वापस लौटना पड़ा।
❖ महमूद गजनवी ने पंजाब को जीतकर अपने राज्य में मिला लिया, किन्तु हरियाणा को अपने राज्य में न मिलाकर यथावत छोड़ दिया।
❖ तुर्क आक्रमण के कारण तोमर शासकों को अत्यधिक धक्का लगा, किन्तु वह धीरे-धीरे अपनी शक्ति को सुदृढ़ करने का प्रयास करते रहे।

मासूद के आक्रमण

❖ महमूद गजनवी के बाद 1037 ई. में उसके पुत्र मासूद (1030-41 ई.) ने हांसी पर आक्रमण किया और तोमर शासक कुमारपाल देव (1021–1051 ई.) से उसका संघर्ष हुआ। 12 दिनों के युद्ध के बाद मासूद की जीत हुई।
❖ कुमारपाल की बेटी ने मासूद के अत्याचारों से बचने के लिए आमेटी दुर्ग के निकट बने तालाब में कूदकर जान दे दी। इस तालाब को आमेटी तालाब कहा जाता है।
❖ हांसी पर मासूद के आक्रमण की जानकारी बहलो द्वारा लिखित पुस्तक तारीख-ए-मुस्कान में मिलती है।
❖ इसके साथ ही उसने थानेसर-कुरुक्षेत्र सहित सारे हरियाणा पर कब्जा हो गया। 1043 ई. में मासूद के बेटे मूदूद ने आक्रमण किया।
❖ तोमर शासक कुमारपाल देव ने अन्य शासकों की सहायता से मासूद को पराजित कर दिया। इस प्रकार 1043 ई. में हरियाणा गजनवी शासन से मुक्त हुआ।
❖ कुमारपाल देव के निधन के बाद अनंगपाल द्वितीय (1051–81 ई.) शासक बना। अनंगपाल द्वितीय ने फरीदाबाद के पास सूरजकुण्ड का निर्माण कराया था।
❖ अनंगपाल द्वितीय जीवनपर्यन्त स्वतंत्र शासक के रूप में शासन करता रहा, क्योंकि उसके शासन रहते किसी भी तोमर राज्य पर आक्रमण करने की हिम्मत नहीं हुई।
❖ 1081 ई. के बाद गजनवी के शासक इब्राहिम ने आक्रमण किया और तोमर शासक तेजपाल (1081–1105 ई.) ने बिना लड़े अधीनता स्वीकार कर ली।

भादानकों का उदय और अंत

❖ भादानक राज्य के अंतर्गत वर्तमान हरियाणा के महेन्द्रगढ़, अलवर व गुरुग्राम सम्मिलित थे। इस राज्य के निवासी भादानक कहलाते थे। यह तोमरों और चौहानों के समकालीन थे।
❖ हर्षकाल के दौरान दक्षिणी-पश्चिमी हरियाणा में ‘भादानक’ नामक लोग अत्यधिक शक्तिशाली हो गये।
❖ वर्तमान में भट्ट खांडी-भिवानी (हरियाणा) क्षेत्र में पाए जाते हैं।
❖ सिद्धेश्वर सूरी अपने ग्रंथ ‘सकल तीर्थ स्रोत’ में भादानकों को कन्नौज तथा हरिपुर के मध्य का निवासी बताते हैं।

❖ प्रतिहार साम्राज्य के खंडित होने के बाद भादानक अहिच्छत्र क्षेत्र के स्वतंत्र शासक बन गये।
❖ विक्रम संवत 1208 में चौहान शासक विग्रहराज चतुर्थ ने भादानकों पर आक्रमण कर उन्हें युद्ध में पराजित किया।
❖ सोमेश्वर के पश्चात विक्रम संवत 1234 ई. में पृथ्वीराज तृतीय गद्दी पर बैठा।
❖ भादानकों व चौहानों के मध्य अंतिम युद्ध पृथ्वीराज तृतीय के शासनकाल में हुआ। इस युद्ध में भादानक पराजित हुए।
❖ चौहान वंश के शक्तिशाली शासक विग्रहराज ने चतुर्थ महाराजाधिराज परमेश्वर की उपाधि धारण की थी।
❖ उसने तोमरों को पूर्ण रूप से नष्ट कर दिल्ली व हांसी के दुर्ग पर कब्जा कर लिया।

हरियाणा में चाहमानों (चौहानों) की सत्ता

❖ तोमर शासक की कमजोरी का लाभ उठाकर 1139 ई. चाहमान शासक अर्णोराज ने हरियाणा पर आक्रमण किया।
❖ अर्णोराज के चाहमान प्रशस्ति (अजमेर संग्रहालय) के अनुसार अर्णोराज की सेनाओं ने यमुना के पानी को गंदा कर दिया और हरियाणा की स्त्रियों ने आंसू बहाए। अर्णोराज ने तोमर शासकों को अपना सामंत बना लिया।
❖ बिजौलिया अभिलेख के अनुसार विग्रहराज चतुर्थ ने तोमर वंश से दिल्ली को छीन लिया।
❖ विग्रहराज का पुत्र नागार्जुन ने गुड़गांव (वर्तमान गुरुग्राम) पहुँचकर गुड़गांव पर अधिकार कर लिया। नागार्जुन के सेनापति देवभट्ट और पृथ्वीराज चौहान के मध्य 1178 ई. में युद्ध हुआ जिसमें देवभट्ट मारा गया तथा नागार्जुन के परिवार को बंदी बना लिया गया। नागार्जुन युद्ध स्थल से भाग गया। इस प्रकार पृथ्वीराज चौहान का गुड़गांव पर पुनः अधिकार हो गया।

मोहम्मद गौरी का आक्रमण

❖ पृथ्वीराज चौहान या पृथ्वीराज तृतीय के काल में हरियाणा में चौहानों का राज हो गया।
❖ मोहम्मद गौरी ने 1175–86 ई. के मध्य निरंतर संघर्ष कर पंजाब को (जिस पर महमूद के वंशज शासन कर रहे थे) अपने अधीन कर लिया।
❖ 1191 ई. में पृथ्वीराज तृतीय तथा हांसी के गोविंद राय की संयुक्त सेना के साथ मोहम्मद गौरी की सेना का तरावड़ी नामक स्थान पर युद्ध हुआ, जिसमें गौरी पराजित हुआ। इसे तराइन का प्रथम युद्ध भी कहा जाता है।
❖ पुनः 1192 ई. में गौरी तथा पृथ्वीराज तृतीय के बीच तराइन का दूसरा युद्ध हुआ, जिसमें पृथ्वीराज पराजित हुआ।
❖ तराइन के दूसरे युद्ध में गोविंद राय युद्धभूमि में शहीद हुए।
❖ इस युद्ध के तीसरे दिन राजपूत सरदार समर सिंह और उनके पुत्र कल्याण सिंह भी युद्ध में मारे गए।
❖ कुछ विद्वानों की मान्यता है कि गौरी ने पृथ्वीराज को अंधा कर दिया और साथ में गोर ले गया और वहां उसका वध कर दिया गया।

❖ तराइन युद्ध के बाद भी 1192 ई. में हांसी क्षेत्र में जाटों नामक राजपूत के नेतृत्व में हरियाणा के लोगों ने गौरी की सेना के साथ युद्ध किया, किन्तु जाटों के मारे जाने पर सेना में भगदड़ मच गई।
❖ इस जीत से खुश होकर मुहम्मद गौरी ने अपने गुलाम कुतुबुद्दीन ऐबक को हांसी का इक्ता प्रदान किया।
❖ रेवाड़ी के राज्यपाल तेजपाल के नेतृत्व में अफगानों से युद्ध हुआ। इस युद्ध में अफगानों के छक्के छुड़ा दिए गए। इस युद्ध में अफगान सेनापति इब्राहिम बारह हजारी मारा गया। इसके पश्चात मुहम्मद गौरी के मुख्य सेनापति कुतुबुद्दीन ऐबक ने रेवाड़ी पर आक्रमण किया जिसमें अहीरवाल की सेना की हार हुई।

तराइन युद्ध के प्रभाव

❖ भारत से चाहमान शासकों के शासन का अंत हुआ तथा देश में मुस्लिम राज्य की स्थापना हुई।
❖ मुस्लिम राज्य की स्थापना के बाद भारत में सर्वाधिक क्षति बौद्ध धर्म की हुई।
❖ हिन्दू मंदिरों का विध्वंस किया गया तथा इस्लाम का प्रसार हुआ।

सल्तनत काल

❖ 1206 ई. में मोहम्मद गौरी की मृत्यु के बाद उसके गुलाम कुतुबुद्दीन ऐबक ने भारत में गुलाम वंश या दास वंश की नींव रखी।
❖ 1526 ई. तक दिल्ली पर तुर्कों और अफगानों का आधिपत्य रहा। भारतीय इतिहास में इस काल को सल्तनत काल कहा जाता है।
❖ दिल्ली सल्तनत में पंजाब, हरियाणा सहित उत्तर भारत का बड़ा भाग शामिल था।

गुलाम वंश

❖ गुलाम वंश के संस्थापक कुतुबुद्दीन ऐबक ने अपनी राजधानी लाहौर में बनायी थी।
❖ ऐबक ने ही कुतुबमीनार की नींव डाली थी। 1210 ई. में ऐबक की मृत्यु चौगान (पोलो) खेलते समय घोड़े से गिरकर हो गयी।
❖ ऐबक के पश्चात आराम शाह आठ महीने तक शासक रहा।
❖ इल्तुतमिश ऐबक का गुलाम एवं दामाद था। इसके शासनकाल में ही हरियाणा क्षेत्र पर पंजाब के प्रशासक कुबाचा और गजनी के शासक यल्दोज ने आक्रमण किए थे।
❖ पंजाब के प्रशासक कुबाचा ने सिरसा के आस-पास के क्षेत्र को अपने अधीन कर लिया लेकिन जल्द ही गजनी के शासक यल्दोज ने कुबाचा को पराजित कर इस क्षेत्र को गजनी राज्य का अंग बना लिया।
❖ 1215 ई. में तराइन (तरोड़ी) का तीसरा युद्ध इल्तुतमिश व यल्दोज के मध्य हुआ। इस युद्ध में यल्दोज पराजित हुआ। यल्दोज को बंदी बनाकर कत्ल कर दिया गया।
❖ इल्तुतमिश के शासनकाल में हरियाणा के मुख्य इक्ते दिल्ली, सिरसा (सरसुती), हांसी, रेवाड़ी, पलवल, पिपली, सरहिंद और नारनौल थे।
❖ हांसी का इक्ता सैनिक एवं आर्थिक महत्व के कारण काफी महत्वपूर्ण था।
❖ तुर्क अमीरों ने शाह तुर्कान के अत्यधिक प्रभाव से परेशान होकर रुक्नुद्दीन को पदच्युत कर रजिया को सिंहासन पर आसीन किया।

❖ वह भारत की पहली मुस्लिम शासिका थी।
❖ 13 अक्टूबर, 1240 को डाकुओं ने हरियाणा में कैथल के पास रजिया और उसके पति अल्तुनिया को बन्दी बना लिया तथा अगले दिन ही उनकी हत्या कर दी।
❖ रजिया का मकबरा कैथल में स्थित है। यह दक्षिण एशिया का प्रथम महिला स्मारक है।
❖ नासिरुद्दीन महमूद ने 1248 ई. में अपने नायब व सेनापति बलबन को मेवातियों के दमन के लिए भेजा, किन्तु बलबन असफल रहा।
❖ मेवातियों का साहस इतना बढ़ गया कि 1257 ई. में हांसी में बलबन के काफिले पर ही आक्रमण कर दिया। 1260 ई. में बलबन ने एक बार पुनः मेवातियों पर आक्रमण किया।
❖ नासिरुद्दीन महमूद ने 1254 ई. में पिंजौर (पंचकुला) के भीम देवी मंदिर (उत्तर भारत का खजुराहो) पर आक्रमण कर मंदिर को नुकसान पहुंचाया।
❖ 1266 ई. में बलबन दिल्ली का सुल्तान बना। इससे पूर्व वह हांसी का इक्तेदार था। उसने मेवात में अराजकता समाप्त करने के लिए वहां के जंगलों को कटवा दिया, जिससे विद्रोही मेवातियों के छिपने के स्थान नष्ट हो जाएं।
❖ मेवात क्षेत्र में शांति कायम करने के उद्देश्य से बलबन ने गुड़गांव (वर्तमान गुरुग्राम) में गोपालगिरी के दुर्ग का निर्माण करवाया और दुर्ग में सैन्य टुकड़ी स्थापित की।
❖ बलबन ने कैथल और सोनीपत में दो नए इक्तों की स्थापना की।
❖ इसके बाद 1265 ई. में बलबन ने एक विशाल सेना के साथ आक्रमण करके मेवातियों को पराजित किया।

खिलजी वंश

❖ बलबन के कमजोर उत्तराधिकारियों के समय हरियाणा के विभिन्न स्थानों पर विद्रोह हुए। अहीरवाल के अहीर, रोहतक तथा हिसार के जाट तथा उत्तरी हरियाणा के जाटों ने विद्रोह किया।
❖ 1290 ई. में खिलजी सरदार जलालुद्दीन ने नए शासन की नींव रखी। 1320 ई. में मुबारक शाह के सेनापति खुसरो शाह ने इस वंश के शासन को समाप्त कर दिया।
❖ दिल्ली का शासक बनने से पूर्व जलालुद्दीन कैथल का मुक्‍ती था।
❖ मेवात के बागी का शासक जलालुद्दीन ने स्वयं आक्रमण करके शांत किया।
❖ जलालुद्दीन की हत्या कर उसका दामाद व भतीजा अलाउद्दीन खिलजी (1296–1316) दिल्ली का सुल्तान बना।
❖ अलाउद्दीन खिलजी (1296–1316) के शासनकाल में मंगोलों ने हरियाणा पर आक्रमण किया। मंगोलों के आक्रमण को हिसार तथा हांसी में अलाउद्दीन खिलजी के हिन्दू सेनानायक नायक ने विफल कर दिया।
❖ अलाउद्दीन खिलजी ने हांसी के बढ़सी गेट का निर्माण करवाया था।

तुगलक वंश

❖ खिलजी शासक के लाहौर और दिपालपुर के गवर्नर गाजी मलिक ने तुगलक वंश की स्थापना की। खुसरोशाह तथा गाजी मलिक के सैनिकों के बीच सरस्वती के स्थान पर युद्ध हुआ।
❖ सरस्वती के युद्ध में गाजी मलिक (गयासुद्दीन तुगलक) को हरियाणा के स्थानीय खापों का साथ मिला। गयासुद्दीन तुगलक को पहला शाही चिन्ह खोखर सरदारों द्वारा प्राप्त हुआ।

❖ गयासुद्दीन तुगलक की मृत्यु के बाद मुहम्मद तुगलक (1325–1351 ई.) गद्दी पर बैठा। उसके समय में हरियाणा में विद्रोह हुए, जिसे दबाने के लिए मुहम्मद तुगलक ने स्वयं सैन्य-संचालन किया।
❖ मुहम्मद तुगलक के समय इब्नबतूता भारत की यात्रा पर आया था। उसने सिरसा तथा हांसी को उत्तर भारत के मुख्य शहरों के रूप में वर्णन किया।
❖ सिरसा अपने लाल रंग के चावल के लिए प्रसिद्ध था।
❖ मुहम्मद तुगलक की मृत्यु के बाद फिरोजशाह तुगलक (1351–1388 ई.) तुगलक वंश का शासक बना।
❖ फिरोजशाह ने धार्मिक कट्टरता के कारण हरियाणा के मेवातियों सहित कई हिन्दुओं को जबरन मुसलमान बना दिया।
❖ फिरोजशाह ने फतेहाबाद, हिसार फिरोजा व सिरसा से 12 मील की दूरी पर एक तीसरा नगर भी बसाया। इसे उसने फिरोजाबाद हरनी खेड़ा का नाम दिया।
❖ फिरोजशाह तुगलक ने हिसार फिरोजा तक पानी पहुँचाने के लिए यमुना व सतलुज से क्रमशः राजबाह तथा सुल्तान नहर निकलवाई।
❖ फिरोजशाह तुगलक ने 1354 ई. में हिसार-ए-फिरोजा नामक नगर बसाया था। उसने 1352 ई. में फतेहाबाद नामक नगर बसाया था। इस शहर में स्थित फिरोजशाह पैलेस को हरियाणा राज्य की सर्वाधिक प्राचीन इमारत माना जाता है।
❖ फिरोजशाह तुगलक ने हिसार नगर में अपनी प्रेमिका व पत्नी गुजरी की याद में गुजरीमहल बनवाया।
❖ इसके अतिरिक्त कृषि को उन्नत करने के लिए फिरोजशाह ने यहाँ बहुत-सी नहरें निकलवाई।

तैमूर का आक्रमण

❖ 1398 ई. में ईरान के शासक तैमूर ने भारत पर आक्रमण कर दिया। वह राजस्थान की ओर से हरियाणा में प्रवेश हुआ और लगभग एक महीने तक यहीं रहा।
❖ तैमूर ने हरियाणा के निनियाँ, सिरसा तथा रोहतक को लूटा। उसने कैथल के पास घग्गर नदी को पार कर करनाल में प्रवेश किया।
❖ तैमूर कैथल, असंध, तुगलकपुर, सालवान आदि को लूटते हुए 3 दिसम्बर 1398 ई. को पानीपत पहुँचा।
❖ तैमूर के आक्रमण से पानीपत का सुल्तान पहले ही नगर छोड़ चुका था। उसने पानीपत को भी जी भरकर लूटा।
❖ तैमूर के वापस जाने के पश्चात मेवात में बहादुर नाहिर और उसके पुत्र कदूबखाँ और जलाल खाँ स्वतंत्र हो गये। कलायत के मोहन सिंह महोरा भी स्वतंत्र हो गया।
❖ तैमूर द्वारा नाममात्र शासन में अपने प्राचीन साम्राज्य को पुनः जीवित करने की न तो योजना थी और न ही इच्छा थी।
❖ तैमूर की वापसी के उपरांत दक्षिण-पश्चिमी हरियाणा के जलाल तथा हसन खाँ और उत्तर में कैथल के मोहन सिंह महोरा के राज्य अधिक महत्वपूर्ण थे। सैय्यद शासकों ने इन खापों से मैत्रीपूर्ण संबंध स्थापित किए।

सैय्यद वंश

❖ तुगलक वंश के पतन के पश्चात 1414 ई. में खिज्र-खाँ ने सैय्यद वंश की स्थापना की। हरियाणा के सोनीपत में खिज्र खाँ का मकबरा बना हुआ है। यह मकबरा पठान शैली में निर्मित किया गया है। इसे इब्राहिम लोदी ने बनवाया था।

लोदी वंश

❖ सैय्यदों के बाद लोदी दिल्ली सल्तनत के शासक बने। बहलोल लोदी के काल में हरियाणा को 1451 ई. में सल्तनत का भाग बना लिया गया। सिकन्दर लोदी की धर्मांधता के कारण कलायत और जींद में विद्रोह हुए।
❖ इब्राहिम लोदी (1517–26) के शासन तक हरियाणा दिल्ली सल्तनत का अंग बना रहा।
❖ इब्राहिम लोदी के कठोर और अमानवीय स्वभाव के कारण अन्य प्रांतों की तरह हरियाणा की जनता भी उससे प्रसन्न नहीं थी।
❖ जब 1526 ई. में पानीपत की पहली लड़ाई में बाबर ने इब्राहिम लोदी के विरुद्ध युद्ध किया, तो यहाँ के लोग लोदी के विरुद्ध थे।
❖ इस युद्ध में बाबर ने इब्राहिम लोदी को पराजित किया।

मुगल सत्ता और संघर्ष

❖ अपने भारत अभियान के दौरान बाबर 1525 ई. में हरियाणा में प्रविष्ट हुआ।
❖ 1526 ई. में बाबर ने मुगल वंश की स्थापना की।
❖ हिसार के फौजदार हामिद खाँ ने बाबर को रोकने का प्रयास किया, किन्तु उसकी हार हुई। बाबर ने हिसार की जागीर हुमायूं को दे दी।

पानीपत का प्रथम युद्ध

❖ 20 अप्रैल, 1526 में हुई पानीपत की पहली लड़ाई में इब्राहिम लोदी मारा गया तथा बाबर ने दिल्ली, हरियाणा तथा आगरा पर अधिकार कर मुगल साम्राज्य की स्थापना की।
❖ इस साम्राज्य में पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, उत्तर प्रदेश तथा बिहार शामिल थे।
❖ 17 मार्च, 1527 को बाबर और हसन खाँ मेवाती के मध्य खानवा का युद्ध हुआ, जिसमें हसन खाँ मारा गया तथा बाबर की विजय हुई।
❖ हसन खाँ के पुत्र नाहर खाँ को क्षमा कर कई लाख राजस्व का परगना दे दिया गया तथा मेवात को साम्राज्य में मिला लिया गया।
❖ राज्य में नव-विजित प्रदेश के प्रशासन को व्यवस्थित तरीके से चलाने के लिए बाबर ने इसे चार सरकारों (जिलों) में बाँट दिया था, जो निम्नलिखित थीं—

  1. दिल्ली सरकार
  2. मेवात सरकार
  3. हिसार सरकार
  4. सरहिन्द सरकार

❖ इसके अतिरिक्त उसने अपने दो विश्वस्त सरदारों—अहसान तैमूर और बुगरा सुल्तान को क्रमशः नारनौल तथा शाहाबाद की जागीरें प्रदान कर दीं।
❖ बाबर ने 1528 ई. व 1529 ई. के क्रमशः मालवा तथा बिहार की लड़ाई लड़ी।
❖ बाबर के शासन के अंतिम दिनों में मोहन सिंह के नेतृत्व में कैथल में मेवातियों ने विद्रोह किया, परंतु उनको बाबर ने पराजित किया और उनके सिरों को मीनार में चुनवा दिया।
❖ उसे प्रशासन को तथा प्रजा के जीवन को उन्नत एवं सुखी बनाने के लिए पर्याप्त समय नहीं मिल पाया।
❖ 26 दिसंबर, 1530 को बाबर की मृत्यु के बाद उसका पुत्र हुमायूं शासक बना।
❖ अपने मेवात की सरकार अपने भाई हिंदाल को दे दी तथा हिसार और सरहिन्द को अपने भाई कामरान के अधीन कर दिया।

❖ पंजाब, काबुल और कंधार भी कामरान के पास थे, किन्तु उसके भाई ही उसके शत्रु बन गए।
❖ 1540 ई. में शेरशाह ने हुमायूं को कन्नौज के युद्ध में परास्त कर दिया। शेरशाह अधिक समय तक शासन नहीं कर सका और 1545 ई. में एक युद्ध के दौरान कालिंजर में तोप का गोला किले की दीवार से टकराकर लौटने के कारण मारा गया।
❖ सरहिन्द के युद्ध (22 जून 1555) के विजय के उपरांत हुमायूं को एक बार पुनः खोया राज्य वापस मिल गया।
❖ हुमायूं ने हरियाणा में फतेहाबाद की मस्जिद का निर्माण करवाया।

पानीपत का द्वितीय युद्ध

❖ हुमायूं की मृत्यु के पश्चात हेमू ने 7 अक्टूबर, 1556 को दिल्ली की गद्दी पर कब्जा कर लिया।
❖ हेमू ने दिल्ली व हरियाणा पर अपना सीधा नियंत्रण स्थापित किया।
❖ 5 नवम्बर, 1556 को पानीपत के प्रसिद्ध ऐतिहासिक मैदान में मुगल सम्राट अकबर व अंतिम हिन्दू सम्राट हेमू की सेनाओं के बीच भयंकर युद्ध हुआ।
❖ हेमू के सैनिक बड़ी बहादुरी से लड़े और उनकी विजय होने ही वाली थी कि दुर्भाग्य से एक तीर हेमू की आँख में लग गया।
❖ यह स्थिति हेमू के सैनिकों के लिए दुर्भाग्य का कारण बन गई और उन्हें अपने सेनानायक को न देख पाने की स्थिति में सेना में भगदड़ की स्थिति उत्पन्न हो गई।
❖ अंततः हेमू अर्द्ध-मूर्छित अवस्था में मुगल सेना द्वारा बंदी बना लिया गया, जहाँ बैरम खाँ द्वारा उसका सिर काट दिया गया।
❖ यही युद्ध पानीपत के इतिहास में द्वितीय युद्ध के नाम से जाना जाता है।
❖ हुमायूं के 13 वर्षीय पुत्र अकबर को दिल्ली की गद्दी प्राप्त हो गई। अकबर का कालान्तर में राज्याभिषेक किया गया तथा बैरम खाँ उसके संरक्षक बनाए गए। अपने राज्य को व्यवस्थित तरीके से चलाने के लिए अकबर ने उसे 15 सूबों में बाँट दिया।
❖ अकबर ने हरियाणा को दिल्ली व आगरा में मिला दिया। उस समय राज्य में 70 परगने थे तथा पाँच सरकारें थीं, जो निम्न प्रकार हैं—

  1. सरकार-ए-दिल्ली
  2. सरकार-ए-खेवड़ी
  3. सरकार-ए-हिसार फिरोजा
  4. सरकार-ए-मेवाती
  5. सरकार-ए-हिन्द

❖ अकबर के मृत्यु के पश्चात 1605 ई. में जहाँगीर शासक बना।
❖ जहाँगीर ने अकबर द्वारा बनाई गई प्रशासनिक व्यवस्था को यथावत रखा।
❖ जहाँगीर ने हरियाणा राज्य क्षेत्र में बड़ी संख्या में वृक्ष लगवाने का आदेश दिया। 1614 ई. में फैले प्लेग में जहाँगीर ने हरियाणा वासियों की बहुत सहायता की।
❖ 1627 ई. में जहाँगीर की मृत्यु के पश्चात उसका पुत्र शाहजहाँ शासक बना।
❖ शाहजहाँ आगरा सूबे से नारनौल क्षेत्र को निकालकर दिल्ली सूबे में शामिल कर दिया।
❖ शाहजहाँ ने प्रशासन की एक नई इकाई चकला को शुरूआत की।
❖ शाहजहाँ ने चौधरी कृपा राम गौड़ को हिसार चकले का प्रमुख बनाया।
❖ 1630 ई. में शाहजहाँ के एक दरबारी ने अंबाला के बुड़िया रामसहल का निर्माण करवाया था।

❖ 1632 ई. के लगभग शाहजहाँ के शासनकाल में फिरोजखान द्वारा निर्मित ‘मामा-भांजा’ मुगलसराय (बरोड़ा) में स्थित है।
❖ शाहजहाँ के बड़े पुत्र दारा शिकोह थानेसर में अपने गुरु शेख चिश्ती से निरंतर संपर्क में रहता था। गुरु की मृत्यु के पश्चात उसने यहाँ एक मकबरे का निर्माण करवाया जिसे ‘हरियाणा के ताजमहल’ के नाम से जाना जाता है। 8 जून 1658 ई. को औरंगजेब को बंदी बनाकर आगरा के किले में डाल दिया गया जहाँ उसने अपने जीवन के आठवें वर्ष अर्थात 22 जनवरी 1666 को 74 वर्ष की आयु में मृत्यु हो गई।
❖ शाहजहाँ के पश्चात 1658 ई. में औरंगजेब शासक बना।
❖ औरंगजेब के शासनकाल में 1669 ई. में गोकुला जाट के नेतृत्व में जाटों का विद्रोह हो गया। इसे तिलपत के युद्ध के नाम से जाना गया। इस युद्ध में गोकुला जाट की हार हुई।
❖ मुगल काल में सबसे अधिक आर्थिक लड़ाई औरंगजेब के शासनकाल में हुई जबकि आना सिक्के का प्रचलन शाहजहाँ ने करवाया।
❖ औरंगजेब को अनेक किसान विद्रोह का सामना करना पड़ा जैसे— बल्लभगढ़ के जाटों का विद्रोह तथा नारनौल के सतनामीयों का विद्रोह।
❖ औरंगजेब के पश्चात बहादुरशाह ने अकबर की नीति को अपनाकर स्थिति को सुधारने का प्रयास किया लेकिन सफलता नहीं मिली।
❖ बहादुरशाह के पश्चात सिंहासन पर एकाधिकार करने के लिए जजिया प्रणाली अपनाई गई जो एक शोषणकारी प्रणाली थी।
❖ औरंगजेब के प्रारंभिक शासनकाल के दौरान 1661 ई. में पिंजौर गार्डन (यादविंद्र उद्यान) का निर्माण किया गया था।
❖ महाराज यदविंद्र सिंह के याद में ‘यादविंद्र गार्डन’ का नाम रखा गया। यह मुगल गार्डन शैली का एक उदाहरण है।

उत्तर मुगल काल

सतनामियों का विद्रोह

❖ किसानों और मुगलों के बीच 1672 ई. में मथुरा के निकट नारनौल नामक स्थान पर एक युद्ध हुआ जिसका नेतृत्व सतनामी नामक एक धार्मिक सम्प्रदाय ने किया था।
❖ इस युद्ध में फौजदार ताहिर खाँ द्वारा उसकी सेना को सतनामियों ने हरा दिया। इसके पश्चात अहीरवाल क्षेत्र के नारनौल पर सतनामियों द्वारा अधिकार कर लिया गया।
❖ इनके द्वारा सारे नारनौल नगर से मुगल शासन के चिह्न मिटा दिए गए।
❖ औरंगजेब ने 15 मार्च, 1672 को एक विशाल मुगल सेना मोहम्मद अकबर तथा हामिद खाँ, याहिया खाँ, कमालुद्दीन आदि अपनी सैनिक सरदारों के साथ नारनौल के लिए भेजा। इस विद्रोह को दबाने में स्थानीय हिन्दू जमींदारों (जिनमें अधिकांश राजपूत थे) ने मुगलों का साथ दिया था।

जाटों का विद्रोह

❖ 1669 ई. में गोकुला जाट के नेतृत्व में जाटों और औरंगजेब के विरुद्ध मथुरा में विद्रोह हुआ। इस विद्रोह का मुख्य कारण हिंदू मंदिरों का तोड़ा जाना एवं हिंदू महिलाओं का अपमान था।

❖ 1632 ई. के लगभग शाहजहाँ के शासनकाल में फिरोजखान द्वारा निर्मित ‘मामा-भांजा’ मुगलसराय (बरोड़ा) में स्थित है।
❖ शाहजहाँ के बड़े पुत्र दारा शिकोह थानेसर में अपने गुरु शेख चिश्ती से निरंतर संपर्क में रहता था। गुरु की मृत्यु के पश्चात उसने यहाँ एक मकबरे का निर्माण करवाया जिसे ‘हरियाणा के ताजमहल’ के नाम से जाना जाता है। 8 जून 1658 ई. को औरंगजेब को बंदी बनाकर आगरा के किले में डाल दिया गया जहाँ उसने अपने जीवन के आठवें वर्ष अर्थात 22 जनवरी 1666 को 74 वर्ष की आयु में मृत्यु हो गई।
❖ शाहजहाँ के पश्चात 1658 ई. में औरंगजेब शासक बना।
❖ औरंगजेब के शासनकाल में 1669 ई. में गोकुला जाट के नेतृत्व में जाटों का विद्रोह हो गया। इसे तिलपत के युद्ध के नाम से जाना गया। इस युद्ध में गोकुला जाट की हार हुई।
❖ मुगल काल में सबसे अधिक आर्थिक लड़ाई औरंगजेब के शासनकाल में हुई जबकि आना सिक्के का प्रचलन शाहजहाँ ने करवाया।
❖ औरंगजेब को अनेक किसान विद्रोह का सामना करना पड़ा जैसे— बल्लभगढ़ के जाटों का विद्रोह तथा नारनौल के सतनामियों का विद्रोह।
❖ औरंगजेब के पश्चात बहादुरशाह ने अकबर की नीति को अपनाकर स्थिति को सुधारने का प्रयास किया लेकिन सफलता नहीं मिली।
❖ बहादुरशाह के पश्चात सिंहासन पर एकाधिकार करने के लिए जजिया प्रणाली अपनाई गई जो एक शोषणकारी प्रणाली थी।
❖ औरंगजेब के प्रारंभिक शासनकाल के दौरान 1661 ई. में पिंजौर गार्डन (यादविंद्र उद्यान) का निर्माण किया गया था।
❖ महाराज यदविंद्र सिंह के याद में ‘यादविंद्र गार्डन’ का नाम रखा गया। यह मुगल गार्डन शैली का एक उदाहरण है।

उत्तर मुगल काल

सतनामियों का विद्रोह

❖ किसानों और मुगलों के बीच 1672 ई. में मथुरा के निकट नारनौल नामक स्थान पर एक युद्ध हुआ जिसका नेतृत्व सतनामी नामक एक धार्मिक सम्प्रदाय ने किया था।
❖ इस युद्ध में फौजदार ताहिर खाँ द्वारा उसकी सेना को सतनामियों ने हरा दिया। इसके पश्चात अहीरवाल क्षेत्र के नारनौल पर सतनामियों द्वारा अधिकार कर लिया गया।
❖ इनके द्वारा सारे नारनौल नगर से मुगल शासन के चिह्न मिटा दिए गए।
❖ औरंगजेब ने 15 मार्च, 1672 को एक विशाल मुगल सेना मोहम्मद अकबर तथा हामिद खाँ, याहिया खाँ, कमालुद्दीन आदि अपनी सैनिक सरदारों के साथ नारनौल के लिए भेजा। इस विद्रोह को दबाने में स्थानीय हिन्दू जमींदारों (जिनमें अधिकांश राजपूत थे) ने मुगलों का साथ दिया था।

जाटों का विद्रोह

❖ 1669 ई. में गोकुला जाट के नेतृत्व में जाटों और औरंगजेब के विरुद्ध मथुरा में विद्रोह हुआ। इस विद्रोह का मुख्य कारण हिंदू मंदिरों का तोड़ा जाना एवं हिंदू महिलाओं का अपमान था।

❖ इसे तिलपत का प्रथम युद्ध के नाम से जाना गया।
❖ इस युद्ध में मुगल फौजदार हसन अली खाँ ने जाटों को परास्त किया तथा गोकुला को बंदी बनाकर मार डाला।
❖ उन्होंने मथुरा और मेवात के परगनों पर अधिकार कर लिया। 1686 ई. में होडल और पलवल पर विजय पाने के पश्चात वे दिल्ली और आगरा के मध्यवर्ती भाग में शक्तिशाली हो गए।
❖ 1685 ई. में राजाराम और उसके भतीजे चुड़ामन के नेतृत्व में जाटों ने दूसरा जाट विद्रोह किया।
❖ इस युद्ध में जाटों ने छापामार हमले के साथ-साथ लूटमार की रणनीति अपनायी। राजाराम ने सिकन्दरा में स्थित अकबर के मकबरे को लूटा तथा मकबरे से अकबर के अवशेषों को निकालकर जला दिया।
❖ 1688 ई. में औरंगजेब के पोत्र बेदर बख्त और आमेर के राजा बिशनसिंह द्वारा राजाराम युद्ध में परास्त हुआ और मारा गया।
❖ राजाराम की मृत्यु के पश्चात उसके भतीजे चुड़ामन ने 1688 ई. में जाट नेतृत्व की बागडोर संभाली और वह औरंगजेब की मृत्यु तक विद्रोहों का नेतृत्व करता रहा। उसने मथुरा के निकट ‘भरतपुर’ नामक एक स्वतंत्र जाट राज्य की स्थापना की।

बंदा बैरागी का संघर्ष

❖ गुरु गोविंद सिंह ने बंदा बैरागी का नाम बंदा बहादुर सिंह रखा।
❖ गुरु गोविंद सिंह के कहने पर ही बाबा बंदा सिंह बहादुर ने संन्यास छोड़ कर युद्ध किए थे। इसके लिए गुरु गोविंद सिंह ने बाबा बंदा सिंह बहादुर को एक तलवार, 5 तीर तथा तीन साथी दिए। उन्होंने इन्हें सरहिंद के किले पर आक्रमण करने का आदेश दिया।
❖ गुरु गोविंद सिंह के पश्चात मुगलों के विरुद्ध सिखों की सैन्य गतिविधियों का नेतृत्व बंदा बैरागी ने किया। उसने सोनीपत के निकट सिंघु-खालसा को अपना मुख्यालय बनाया।
❖ मुगल साम्राज्य के विरुद्ध संघर्ष में बंदा बैरागी ने सोनीपत, कैथल, समाना, सरहिंद, शाहाबाद व कुंजपुरा को जीत लिया था, किन्तु 1710 ई. में मुगल सम्राट बहादुर शाह ने करनाल व नवांडा के बीच हुए तीन संघर्षों में बंदा बैरागी को हरा दिया।
❖ हरियाणा राज्य के सोनीपत के सिसोली खांडा गाँव में बाबा बंदा सिंह बहादुर की प्रतिमा तथा संग्रहालय स्थापित किया गया।

नादिरशाह का आक्रमण

❖ 1739 ई. में मुगल शासक मोहम्मद शाह ‘रंगीला’ के शासनकाल में ईरान के शासक नादिरशाह का आक्रमण हुआ। वह पंजाब को पार करता हुआ करनाल तक आ पहुँचा।
❖ 24 फरवरी, 1739 को हुए इस युद्ध में करनाल के नवाब सादत खाँ और अवध के नवाब वजीर सफदरजंग ने अपनी सेना के साथ युद्ध में भाग लिया, किन्तु नादिरशाह के हमले को रोका न जा सका। इसे ‘करनाल का युद्ध’ भी कहा जाता है।
❖ दक्षिण दिशा से भरतपुर का जाट राजा सूरजमल आया और उसने फरीदाबाद के आस-पास के क्षेत्र पर अधिकार कर लिया।
❖ पश्चिम दिशा से जयपुर का राजा सवाई जयसिंह आया और उसने कोसली (महेंद्रगढ़) तथा नारनौल क्षेत्र पर अधिकार कर लिया।

❖ रेवाड़ी के अहीर चौधरी ने रेवाड़ी और शाहजहांपुर पर कब्जा कर लिया, जबकि फर्रुखनगर के बिलौच सरदार ने गुरुग्राम, झज्जर और रोहतक के क्षेत्रों पर गहरा प्रभाव जमा लिया।
❖ उसके जातीय भाई असदुल्ला खाँ और बहादुर खाँ ने क्रमशः तावडू और बहादुरगढ़ पर और हसन अली ने झज्जर पर अधिकार कर लिया।
❖ नवाबों ने कुरुक्षेत्र और करनाल के कुछ क्षेत्रों (इन्द्री, अंजनाबाद, पिपली और शाहाबाद परगनों के लगभग 150 गाँव) पर अधिकार कर लिया।

रेवाड़ी के अहीर शासक

❖ औरंगजेब के काल में नंदराम नामक एक अहीर ने (गांव बोलनी गाँव का) रेवाड़ी में अहीर राज्य की स्थापना की थी।
❖ उसके बाद बालकिशन वहाँ का शासक बना। उसकी वीरता से प्रभावित होकर मुगल सम्राट मोहम्मद शाह ने उसे शमशेर बहादुर की उपाधि प्रदान की।
❖ 1739 ई. में नादिरशाह के आक्रमण के समय बालकिशन ने मोहम्मद शाह का साथ दिया। वह नादिरशाह के साथ हुए युद्ध में मारा गया। उसके बाद उसका भाई गुर्जरल शासक बना।
❖ मुगल सम्राट मोहम्मद शाह ने गुर्जरल को राव की उपाधि से सम्मानित किया। मोहम्मद शाह ने उसे फौजदार का पद प्रदान किया। उसने हिसार, हांसी, गुड़गांव, नारनौल और दादरी को अपने राज्य में मिला लिया।
❖ घसेड़ा का बहादुर सिंह तथा फर्रुखनगर का बिलौच प्रमुख गुर्जरल के दो प्रमुख शत्रु थे।
❖ बहादुर सिंह नामक व्यक्ति ने नीमराणा के ठाकुर टोडरमल की सहायता से गुर्जरल को अपने घर बुलाया तथा उसकी हत्या कर दी। इसके बाद उसका पुत्र भवानी सिंह रेवाड़ी का शासक बना।
❖ राव गुर्जरल ने रामगढ़, जैनेपुर तथा श्रीनगर नामक तीन गाँवों की स्थापना की थी। इन्होंने ही गोपलपुरा नाम से अपना सिक्का चलवाया।
❖ झज्जर, जयपुर तथा फर्रुखनगर के शासकों ने उसके राज्य छीन लिए तथा उसके पास केवल 23 गाँवों की जागीर ही रह गई।

मराठों का प्रादुर्भाव तथा सिख शक्ति

❖ अक्टूबर, 1754 को तत्कालीन मुगल सम्राट आलमगीर ने मराठों के प्रति कृतज्ञता प्रकट करते हुए उन्हें हरियाणा का पवित्र स्थान कुरुक्षेत्र प्रदान कर दिया, किन्तु मराठा इतने से ही सन्तुष्ट होने वाले नहीं थे।
❖ रोहतक तथा हिसार के बिलौच तथा अन्य अफगान सरदार उनके आते ही भाग खड़े हुए।
❖ रेवाड़ी के अहीर शासक ने कुछ समय के लिए उनका विरोध किया, किन्तु वह भी असफल रहा। जाटों और राजपूतों ने बिना लड़े ही उनकी अधीनता स्वीकार कर ली।
❖ 1756–57 ई. तक मराठे हरियाणा पर पूर्णतया छा गए। हरियाणा पर अधिकार करने के पश्चात मराठे आगे बढ़े और देखते-ही-देखते उन्होंने पंजाब पर कब्जा कर लिया।

पानीपत का तृतीय युद्ध

❖ पानीपत का तीसरा युद्ध मराठों और अफगान शासक अहमदशाह अब्दाली के मध्य 14 जनवरी, 1761 को हुआ, जिसमें मराठा बुरी तरह पराजित हुए। इस युद्ध के साथ मराठों का पतन हो गया।

❖ अब्दाली ने वापस लौटने से पूर्व हरियाणा प्रदेश के उत्तरी भाग को (जिसमें आजकल के अंबाला, जींद, कुरुक्षेत्र तथा करनाल जिले सम्मिलित हैं) सरहिन्द के अपने गवर्नर जैन खाँ के अधीन कर दिया और शेष बचे हुए क्षेत्र को मुगल साम्राज्य का पूर्ववत भाग बना रहने दिया। बाद में जैन खाँ ने हरियाणा के उत्तरी हिस्सों पर अधिकार कर लिया।

तत्कालीन हरियाणा के शासक (1761–1800)

नजफ खाँ

❖ वर्ष 1773 में नजफ खाँ को दक्षिण हरियाणा का कार्यभार सौंपा गया।
❖ दिल्ली से मराठों को निष्कासित करने के पश्चात नजफ खाँ दिल्ली का सर्वेसर्वा बन गया।
❖ अपनी सेनाओं ने जाटों से रेवाड़ी, गुड़गांव और झज्जर, राजपूतों से कानौड़ (महेंद्रगढ़) और नारनौल, बिलौचों से सोनीपत, रोहतक और भिवानी, सिखों से हिसार और सिरसा तथा सिक्खों से करनाल और अंबाला छीन लिए।
❖ कई शक्तियों ने मिल कर 1787 ई. में महादजी सिंधिया को दिल्ली से निकाल दिया, किन्तु 1789 ई. में सिंधिया ने दिल्ली पर आक्रमण कर गुलाम कादिर को कैद कर निर्दयतापूर्वक उसकी हत्या कर दी।

महादजी सिंधिया

❖ महादजी सिंधिया ने दिल्ली पर अधिकार करते ही हरियाणा की ओर ध्यान दिया।
❖ नवम्बर, 1789 में महादजी सिंधिया ने होल्कर से एक समझौता कर मेवात तथा पानीपत पर अधिकार किया।
❖ उत्तर में सिखों ने अंबाला, करनाल और जींद के किले अपने अधिकार में कर लिए थे, जो मराठों के प्रबल शत्रु थे।
❖ नजफकुली खाँ रेवाड़ी, गुरुग्राम, झज्जर और रोहतक के क्षेत्रों का प्रशासक था, जो गोहदगढ़ को अपनी राजधानी बनाकर स्वतंत्र शासक की तरह काम कर रहा था।
❖ महादजी ने विजित प्रदेश के प्रशासन को उत्तम ढंग से चलाने के लिए कारगर कदम उठाए।
❖ सर्वप्रथम उसने इस समस्त प्रदेश को निम्नलिखित चार जिलों में बाँट दिया—
(i) दिल्ली जिला इसमें राजधानी और इसके आस-पास का क्षेत्र सम्मिलित था।
(ii) सोनीपत जिला इसमें करनाल और दिल्ली के बीच का उत्तरी हरियाणा सम्मिलित था। इस प्रकार सोनीपत में वर्तमान सोनीपत तथा करनाल जिले सम्मिलित थे।
(iii) हिसार जिला इसमें हिसार और रोहतक जिलों के कुछ भाग सम्मिलित थे।
(iv) मेवात जिला इसमें गुरुग्राम, रेवाड़ी, नारनौल और कानौड़ के क्षेत्र सम्मिलित थे।

जॉर्ज थॉमस

❖ जॉर्ज थॉमस आयरलैंड का निवासी था। वह 1782 ई. में भारत के मद्रास पहुँचा। हरियाणा में उसे ‘जहन साहब’ कहा जाता था।
❖ कोई व्यापार या रोजगार न मिलने के कारण वह डाकुओं की तरह लूटमार करने लगा।
❖ इसके बाद उसने छह महीनों तक हैदराबाद के निजाम की सेना में तोपची की नौकरी की।
❖ वह दिल्ली पहुँचकर 1787 ई. में मराठा बेगम की सेना में भर्ती हो गया।
❖ समरु बेगम ने 1789 ई. में रेवाड़ी के 14 गांवों की रक्षा का कार्य जॉर्ज थॉमस को सौंपा था। जॉर्ज थॉमस सरधना को समरु बेगम का विश्वास पात्र बन गया।

❖ समरु बेगम ने उसे टप्पल की जागीर के कलेक्टर के रूप में नियुक्त कर दिया।
❖ जॉर्ज थॉमस द्वारा जारी सिक्कों को ‘सिक्का-ए-साहिब’ कहा जाता है।

मराठों के साथ जॉर्ज थॉमस का सम्बन्ध

❖ 1793 ई. में मेवात क्षेत्र के मराठा सूबेदार ने थॉमस को मेवात की व्यवस्था संभालने का अधिकार दे दिया।
❖ उसके काम से प्रसन्न होकर मराठा सूबेदार खांडेराव ने थॉमस को झज्जर और पटौदी के कुछ गांव जागीर के रूप में दे दिए।
❖ 1797 ई. में उसे सहारनपुर दे दिया गया, जहाँ थॉमस ने सिखों के आतंक को समाप्त कर दिया।
❖ जॉर्ज थॉमस ने धीरे-धीरे दिल्ली, करनाल और पटियाला के कुछ भागों पर अधिकार जमा लिया तथा उसके बाद उसका विस्तार किया।
❖ इस क्षेत्र में रोहतक, गुरुग्राम, हिसार, सोनीपत व भिवानी के 14 परगने और 253 गाँव थे, जिससे 2 लाख 86 हजार रुपये की वार्षिक आय होती थी।
❖ इसके अतिरिक्त थॉमस को मराठों से और भी 151 गाँव मिले थे, जो 5 परगनों में थे, जिनसे 1 लाख 44 हजार रुपये की वार्षिक आय होती थी। इस प्रकार जॉर्ज थॉमस के अधिकार में कुल 800 गाँव थे।

जॉर्ज थॉमस एवं सिखों में संघर्ष

❖ जॉर्ज थॉमस ने 1798 ई. में जींद को जीत लिया। अन्य सिख नरेश शाह शुजा के साथ युद्ध में व्यस्त थे।
❖ पटियाला के राजा साहिब सिंह की बहन बीबी साहिब कौर जींद नरेश भागसिंह की सहायता हेतु आई थी, किन्तु थॉमस की सेना ने उसे पीछे धकेल दिया।
❖ पेरे एक फ्रांसीसी था तथा वह जॉर्ज थॉमस को नष्ट करना चाहता था। अतः उसने थॉमस पर आक्रमण कर दिया। बाद में थॉमस ने जहाजगढ़ में पेरे को पराजित किया, किन्तु पेरे के दोस्त बोने ने थॉमस के साथ युद्ध किया।
❖ इसी समय बोने को सहायता के लिए सिख सेना भी आ गई। जॉर्ज थॉमस को झज्जर के पास घेर लिया गया।
❖ 23 दिसंबर, 1801 को थॉमस ने बोने के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया।
❖ 22 अगस्त, 1802 को बरारपुर में थॉमस की मृत्यु हो गई तथा 1803 ई. में ईस्ट इंडिया कम्पनी ने मराठों से उसका राज्य प्राप्त कर लिया।

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Medieval History of Haryana क्या है और Haryana GK में इसका क्या महत्व है?

Medieval History of Haryana में मध्यकालीन समय (लगभग 7वीं से 18वीं सदी) के दौरान हुए राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक विकास को शामिल किया जाता है। Haryana GK में यह विषय महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें दिल्ली सल्तनत, मुगल शासन और प्रमुख युद्धों से जुड़े प्रश्न पूछे जाते हैं।

Medieval History of Haryana में कौन-कौन से प्रमुख राजवंश शामिल हैं?

Medieval History of Haryana में प्रमुख रूप से पुष्यभूति वंश (हर्षवर्धन), तोमर वंश, दिल्ली सल्तनत और मुगल साम्राज्य का शासन शामिल है, जिन्होंने इस क्षेत्र के इतिहास को गहराई से प्रभावित किया।

Haryana GK के अनुसार Medieval History of Haryana में पानीपत की लड़ाइयों का क्या महत्व है?

Haryana GK में Medieval History of Haryana के तहत पानीपत की तीनों लड़ाइयाँ बहुत महत्वपूर्ण मानी जाती हैं—1526, 1556 और 1761—जिन्होंने भारत की राजनीतिक दिशा को बदल दिया और मुगल व अन्य शक्तियों के उदय-पतन को प्रभावित किया।

Medieval History of Haryana के महत्वपूर्ण टॉपिक्स कहाँ से पढ़ें?

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प्रतियोगी परीक्षाओं में Medieval History of Haryana क्यों जरूरी है?

Haryana GK की तैयारी करने वाले छात्रों के लिए Medieval History of Haryana जरूरी है क्योंकि इसमें विदेशी आक्रमण, राजवंश, और ऐतिहासिक युद्धों से जुड़े प्रश्न बार-बार पूछे जाते हैं, खासकर HSSC, CET और HPSC परीक्षाओं में।

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