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Haryana GK: History of Haryana Notes PDF Download हरियाणा का प्राचीन इतिहास

By Ravi Yadav

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यदि आप हरियाणा सामान्य ज्ञान (Haryana GK) की तैयारी कर रहे हैं, तो “Haryana GK: History of Haryana Notes PDF Download हरियाणा का प्राचीन इतिहास” एक अत्यंत महत्वपूर्ण विषय है। हरियाणा का प्राचीन इतिहास सिंधु घाटी सभ्यता, वैदिक काल और महाभारत काल जैसी महत्वपूर्ण घटनाओं और सभ्यताओं से जुड़ा हुआ है, जिसने इस क्षेत्र की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक विरासत को समृद्ध बनाया। इस विषय से संबंधित प्रश्न प्रतियोगी परीक्षाओं में अक्सर पूछे जाते हैं। इस ब्लॉग पोस्ट में हम आपको हरियाणा के प्राचीन इतिहास से जुड़े सरल, सटीक और विस्तृत नोट्स प्रदान करेंगे, जिससे आपकी तैयारी मजबूत होगी। साथ ही, आप इन नोट्स का PDF डाउनलोड करके आसानी से त्वरित पुनरावृत्ति भी कर सकते हैं।

प्राचीन इतिहास

❖ भारतीय गणतंत्र में, एक अलग राज्य के रूप में, हरियाणा की स्थापना यद्यपि 1 नवम्बर, 1966 को हुई किन्तु एक विशिष्ट भौगोलिक एवं सांस्कृतिक इकाई के रूप में हरियाणा का अस्तित्व प्राचीन काल से रहा है।
❖ वैदिक ग्रंथों में जिस प्रदेश को ब्रह्मावर्त कहा गया है, वह पंजाब और हरियाणा का क्षेत्र है। मनु के अनुसार, इस प्रदेश का अस्तित्व देवताओं से हुआ था, इसलिए इस प्रदेश को ब्रह्मावर्त नाम दिया गया था।
❖ हरियाणा राज्य में लगभग 1.5 करोड़ वर्ष पूर्व के मानव जीवन के साक्ष्य मिलते हैं।
❖ सरस्वती में हरियाणावर्त का उल्लेख मिलता है जो कुरुक्षेत्र का प्राचीन नाम माना जाता है।
❖ शतपथ ब्राह्मण में कुरुओं का उल्लेख मिलता है जिनके नाम पर कुरुक्षेत्र का नाम पड़ा।

ऐतिहासिक स्रोत

❖ प्राचीन इतिहास के स्रोत को मुख्यतः तीन भागों में बांटा जाता है—

  1. साहित्यिक स्रोत
  2. पुरातात्विक स्रोत
  3. आधुनिक स्रोत

1. साहित्यिक स्रोत

❖ हरियाणा के इतिहास को जानने के लिए साहित्यिक सामग्री को मुख्यतः 5 श्रेणियों में रखा जा सकता है—
(i) वैदिक साहित्य
(ii) बौद्ध साहित्य
(iii) जैन साहित्य
(iv) महाभारत तथा बाद का संस्कृत साहित्य
(v) विदेशी वृत्तांत

(i) वैदिक साहित्य

❖ लगभग सभी इतिहासकारों का यह मानना है कि अधिकांश वैदिक साहित्य वेद, उपनिषद, ब्राह्मण, आरण्यक आदि की रचना हरियाणा के आस-पास हुई थी।
❖ ऋग्वेद के 8वें मंडल के 25वें सूक्त की 22वीं ऋचा (श्लोक) में ‘राजे हरियाणे’ शब्द का उल्लेख हुआ है।
❖ साहित्यिक स्रोतों के अनुसार, वैदिक आर्यों का मुख्य स्थल हरियाणा था।
❖ ऋग्वेद में ही ‘शर्यणावत’ का उल्लेख मिलता है जो कुरुक्षेत्र का प्राचीन नाम माना जाता है। इस स्थान की पहचान कनिंघम ने कुरुक्षेत्र में स्थित विशाल सरोवर (ब्रह्मसरोवर) के रूप में किया है।
❖ ऋग्वेद में ही दस तंत्रकालीन कबीलों के बारे में विस्तृत जानकारी मिलती है, जिसमें सरस्वती नदी महत्वपूर्ण नदी थी।
❖ ऋग्वेद के ब्राह्मण ग्रंथ (शतपथ ब्राह्मण और ऐतरेय ब्राह्मण) में इस राज्य के सामाजिक व आर्थिक जीवन की जानकारी मिलती है।

❖ कुरुओं का उल्लेख हमें शतपथ ब्राह्मण में मिलता है, जिनके नाम पर कुरुक्षेत्र का नाम पड़ा।
❖ जैमिनीय ब्राह्मण से हमें प्राचीनकालीन हरियाणा के सामान्य जनजीवन की जानकारी प्राप्त होती है।
❖ छांदोग्य उपनिषद से हमें प्राचीनकालीन हरियाणा के सामाजिक तथा आर्थिक जीवन की जानकारी प्राप्त होती है।

(ii) बौद्ध साहित्य

❖ बौद्ध ग्रंथ दिव्यावदान, मज्झिमनिकाय आदि ग्रंथों से हरियाणा के जन-जीवन का उल्लेख मिलता है। दिव्यावदान में उल्लिखित अयोद्धा व रोहतक बौद्ध धर्म के प्रचार केंद्र थे।
❖ पंचवर्षीय ग्रंथ से पता चलता है कि महात्मा बुद्ध ने राज्य के कई स्थानों का भ्रमण किया था।
❖ बौद्ध साहित्य ‘मज्झिमनिकाय’ से हमें राज्य के तत्कालीन राजनीतिक जीवन की जानकारी मिलती है।
❖ दिव्यावदान ग्रंथ के अनुसार रोहतक नगर 12 योजन लंबा तथा 7 योजन चौड़ा था जिसमें 62 दरवाजे लगे थे।
❖ चुल्लवग्ग ग्रंथ से पता चलता है कि अग्रोहा (अग्रेय) बौद्ध धर्म का प्रमुख केंद्र था।
❖ दीपवंश ग्रंथ से पता चलता है कि महात्मा बुद्ध ने कुरुक्षेत्र के यात्रा के दौरान यहां से दान प्राप्त किया था।
❖ विनयपिटक ग्रंथ से पता चलता है कि महान वैद्य जीवक रोहतक के निवासी थे।
❖ जातक ग्रंथों में अनेक स्थानों पर कुरुक्षेत्र का उल्लेख मिलता है।
❖ अशोक के तुगलकदोहित में महात्मा बुद्ध ने आकर स्वयं प्रवचन दिए थे। यहां का शासक रुद्रपाल महात्मा बुद्ध का शिष्य बना।
❖ दीर्घनिकाय के अम्बसट्ठ में सोलह महाजनपदों की चर्चा बौद्ध साहित्य में विस्तृत रूप से हुई है।
❖ आधुनिक हरियाणा के भाग उस समय कुरु और पांचाल महाजनपदों के भाग थे।

(iii) जैन साहित्य

❖ कथाकोष तथा भगवतीसूत्र में प्रथम शताब्दी से तीसरी शताब्दी तक के सांस्कृतिक जीवन के विषय में जानकारी मिलती है।
❖ अग्रोहा उस समय सांस्कृतिक केंद्र था। प्रथम सदी में लोहाचार्य नामक जैन विद्वान अग्रोहा में रहते थे।
❖ जैन कवि पुष्पदंत ने ‘महापुराण’ तथा श्रीधर ने ‘पार्श्वनाथचरित’ में हरियाणा प्रदेश का उल्लेख किया है।
❖ जैन ग्रंथों में कई जगहों पर रोहतक का उल्लेख किया गया है। महाराजा अग्रसेन का संबंध अग्रोहा नगर से था।
❖ होली (हिसार) में निवास करने वाले विद्वान ‘जिन वल्लभ सूरी’ ने हरियाणा में जैन धर्म को पुनर्जीवित किया था।
❖ पुष्पदंत के ‘जसहर चरित्र’ व समंतदेव के ‘यशस्तिलक चम्पू’ की रचनाओं के अनुसार हरियाणा पशुधन से समृद्ध था।

❖ ‘यशस्तिलक चम्पू’ में तोमर राजाओं के शासनकाल के दौरान राज्य में कला एवं संस्कृति और व्यापार के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी मिलती है।
❖ पुष्पदंत ने महापुराण नामक ग्रंथ में राज्य के लिए ‘हरियाण’ शब्द का इस्तेमाल किया है।

(iv) महाभारत

❖ महाभारत की रचना कुरुक्षेत्र (हरियाणा) में महर्षि वेद व्यास द्वारा की गयी।
❖ महाभारत महाकाव्य में ‘नकुल दिग्विजयम्’ शीर्षक के अन्तर्गत नकुल द्वारा रोहतक व सिरसा पर विजय प्राप्त करने का वर्णन है।
❖ महाभारत के आर्यक पर्व में राज्य के अनेक महत्वपूर्ण स्थानों का वर्णन मिलता है।
❖ पांडवों के अज्ञातवास में राज्य के कई नगरों (सोनीपत (स्वर्णप्रस्थ), रोहतक (रोहितक), सिरसा (सिरसा), सुनेत (सुनेत), शोनप्रस्थ (सोनपत), जांगलदेश (जांगलदेश), श्रवण (श्रवण), कालकट (कालका), इक्कर (फतेहाबाद), इश्कर (हिसार) आदि का उल्लेख मिलता है।
❖ अनेक संस्कृत ग्रंथ— अष्टाध्यायी, महाभाष्य, हर्षचरित इत्यादि में हरियाणा के विषय में संकेत प्राप्त होते हैं।

पौराणिक साहित्य

❖ पुराणों के माध्यम से ही हरियाणा के प्राचीन इतिहास की जानकारी मिलती है, जिसमें वामन पुराण प्रमुख है।
❖ वामन पुराण में सात वनों (1. काम्यक वन, 2. अदिति वन, 3. व्यास वन, 4. फलकी वन, 5. सूर्य वन, 6. मधु वन 7. शीत वन) का उल्लेख है।
❖ वामन पुराण में नौ नदियों (1. सरस्वती, 2. दृषद्वती, 3. अपगा, 4. मन्दाकिनी, 5. मधुश्रवा, 6. वाणस्रुति, 7. कौशिकी, 8. दृषद्वती, 9. हिरण्यवती) का उल्लेख है।

(v) विदेशी वृत्तांत

❖ विदेशी यात्रियों— फाह्यान, ह्वेनसांग, अलबरूनी आदि ने अपनी यात्रा विवरणों में हरियाणा के विषय में जानकारी दी है।
❖ ह्वेनसांग द्वारा थानेसर (स्थानेश्वर) नगर के वैभव व समृद्धि का वर्णन किया गया है।
❖ अलबरूनी ने अरबी भाषा में लिखित अपने ग्रंथ ‘किताब-उल-हिंद’ में महमूद के थानेसर आक्रमण के समय हरियाणा की स्थिति पर महत्वपूर्ण प्रकाश डाला है। इसके अतिरिक्त इन्होंने अपनी पुस्तक में उस समय के कुरुक्षेत्र, पानीपत, कैथल व हांसी जैसे नगरों का वर्णन भी किया है।
❖ अलबरूनी ने अपनी पुस्तक ‘किताब-उल-हिंद’ में ब्रह्मसरोवर का भी वर्णन किया है।
❖ अलबरूनी के अनुसार थानेसर में लोगों को सूर्य मंदिर में अत्यधिक गहन आस्था थी।
❖ मोरक्को निवासी इब्नबतूता ने अपने भारतीय प्रवास के दौरान हांसी व सिरसा की यात्रा की थी। उसने हांसी के बारे में लिखा कि यहाँ की आबादी काफी कम थी।
❖ उसने अपने यात्रा-वृत्तांत में इस बात का भी उल्लेख किया है कि साम्राज्य के मुख्य काजी का संबंध हांसी से था।
❖ फीरोजशाह तुगलक की कृति ‘तारीख-ए-फिरोजशाही’ से हमें पता चलता है कि उसके पूर्वजों का संबंध हरियाणा के कैथल सैयद खानदान से था।

❖ कल्हण द्वारा रचित ‘राजतरंगिणी’ ग्रंथ से ज्ञात होता है कि रोहतक का एक व्यापारी बहुत सम्पन्न था व उसकी पत्नी रत्नेश्वरी से ललितादित्य मुक्तापीड नामक पुत्र का जन्म हुआ था।
❖ कश्मीर के शासक ललितादित्य मुक्तापीड ने हरियाणा क्षेत्र के शासक को पराजित कर यमुना के कालकूट तक का क्षेत्र अपने अधीन कर लिया था।

पुरातात्विक स्रोत

❖ सर एलेक्जेंडर कनिंघम, जिन्हें भारतीय पुरातत्व का जनक कहा जाता है, ने 1862 ई. में हरियाणा क्षेत्र का भ्रमण किया था।
❖ हरियाणा में प्रथम पुरातात्विक खुदाई डॉ. डी.बी. स्पूनर ने वर्ष 1921-22 में थानेसर के निकट राजा कर्ण के किले नामक टीले पर कराई थी।
❖ प्रो. बी.बी. लाल के नेतृत्व में कुरुक्षेत्र के अमीन, पेहोवा, थानेसर आदि स्थलों से कई महत्वपूर्ण पुरातात्विक सामग्री एकत्र की गई।
❖ वर्ष 1974–75 में हरियाणा पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग ने बनावली, अग्रोहा तथा कुणाल स्थल की खुदाई की। यह हड़प्पा सभ्यता से जुड़े स्थल हैं।
❖ इसी प्रकार वर्ष 1975–76 में भगवानपुरा तथा काशीथल की पुरातात्विक खुदाई हुई, जहां से पुरातात्विक साक्ष्य (सिक्के, आभूषण, मुहरें) आदि मिले हैं।
❖ पुरातात्विक अवशेषों तथा खुदाइयों से प्राप्त होने वाली पुरातात्विक महत्व की सामग्री को अध्ययन की दृष्टि से पांच वर्गों में बांटा जा सकता है— (i) अभिलेख, (ii) सिक्के, (iii) मुद्रांक, (iv) मूर्तियाँ, (v) स्मारक।

(i) अभिलेख

❖ हरियाणा से आज्ञापत्र, दानपत्र आदि के रूप में 37 अभिलेख प्राप्त हुए हैं। अभिलेख— धार्मिक, प्रशस्ति, स्मारक, दान-पत्र तथा आज्ञा-पत्र के रूप में उत्कीर्ण किए गए थे।
❖ हरियाणा से अभिलेखों में सबसे महत्वपूर्ण अंबाला के निकट टोपरा से प्राप्त अशोककालीन स्तम्भ है।
❖ अंबाला के पास टोपरा से अशोक का स्तम्भ प्राप्त हुआ है। ये लेख ब्राह्मी लिपि एवं प्राकृत भाषा में उत्कीर्ण हैं।
❖ बारहवीं शताब्दी के राजा विग्रहराज चतुर्थ के तीन अभिलेख भी टोपरा के स्तम्भ पर अंकित हैं।
❖ इस टोपरा अभिलेख के अध्ययन से यह ज्ञात होता है कि विग्रहराज चतुर्थ ने तोमर राजा को पराजित कर हरियाणा पर अधिकार किया था।
❖ अशोक द्वारा उज्जरक की मीनार फतेहाबाद में उत्कीर्ण टोपरा अभिलेख को फिरोजशाह तुगलक ने दिल्ली के फिरोजशाह कोटला में स्थापित करवाया था।
❖ करनाल से प्राप्त खरोष्ठी लिपि में अंकित अभिलेख किसी तालाब के निर्माण से सम्बंधित है।
❖ यमुनानगर से प्राप्त सुघ अभिलेख राज्य में दूसरा सबसे प्राचीन अभिलेख है।
❖ यह अभिलेख सम्पूर्ण भारत में ब्राह्मी लिपि की लिखाई का सर्वाधिक प्राचीन (दूसरी शती ईसा पूर्व) अभिलेख है। इस प्राप्त अभिलेख में मिट्टी की एक छोटी मूर्ति में एक बालक तथा पशु आकृति का वर्णन किया गया है। वर्तमान में यह अभिलेख दिल्ली के राष्ट्रीय संग्रहालय में सुरक्षित है।

❖ हिसार के गुजरी महल के एक स्तम्भ पर आठ अभिलेख हैं, जो आठ स्थानों से आने वाले भक्तों की सूचना देते हैं।
❖ इस अभिलेख से यह ज्ञात होता है कि प्राचीन काल में हिसार एक तीर्थ स्थल के रूप में विकसित था।
❖ अग्रोहा अभिलेख यौधेय गण की प्रशासनिक व्यवस्था पर प्रकाश डालता है। इसमें यौधेयों की वीरता की बहुत प्रशंसा की गई है।
❖ अग्रोहा अभिलेख में यौधेयों की राजधानी रोहतक को दर्शाया गया है। इस अभिलेख में यौधेयों की लड़ाकू जाति के रूप में वर्णन किया गया था।
❖ अग्रोहा से प्राप्त एक अभिलेख पर संगीत के सात स्वरों का अंकन है।
❖ भिवानी जिले में स्थित तोशाम में तोशाम अभिलेख प्राप्त हुए हैं जो तीसरी-चौथी शताब्दी के सन्धिकाल के हैं।
❖ इस अभिलेख में आचार्य सोमत्राता द्वारा विष्णु के एक मंदिर तथा दो सरोवरों के निर्माण की बात कही गई है।

❖ पाँचवीं शती के आस-पास निर्मित लाडोस अभिलेख में कुरुक्षेत्र को महातीर्थ की संज्ञा दी गई है।
❖ लाडोस के शासक श्री देवका के कुरुक्षेत्र आने का वर्णन लाडोस अभिलेख में मिलता है।
❖ पेहोवा से गुर्जरवंश का अभिलेख प्राप्त हुआ है। यह अभिलेख 9वीं शताब्दी का है। पेहोवा घोड़ों के व्यापार के लिए प्रसिद्ध था।
❖ पिंजौर अभिलेख से हमें यह पता चलता है कि प्राचीन काल में पिंजौर को पंचपुर कहा जाता था।
❖ खरोष्ठी लिपि में लिखे गए करनाल अभिलेख में मंदिर और सरोवर का वर्णन किया गया है।
❖ मोहिंदगढ़ी अभिलेख रोहतक जिले से प्राप्त किया गया है। इस अभिलेख में यहाँ के विष्णु मंदिर की बात की गई है।
❖ 10वीं शताब्दी के कुछ अभिलेख मोहिंदगढ़ी (झज्जर) और गुरावड़ा (रेवाड़ी) से मिले हैं, जो वैष्णव मंदिरों के निर्माण से संबंधित हैं।

(ii) मुद्राएँ

❖ हरियाणा का 200 ई.पू. से 300 ई.पू. तक का इतिहास लगभग सिक्कों पर निर्भर है। सिक्कों के अध्ययन को मुद्रा विज्ञान (Numismatics) कहा जाता है।
❖ खोखराकोट (रोहतक) से इंडो-ग्रीक शासकों (प्रथम शताब्दी ई.पू.) के सिक्के प्राप्त हुए हैं।
❖ सुघ, अग्रोहा, नारनौल आदि स्थानों से आहत सिक्के मिले हैं। आहत सिक्कों पर पशुओं तथा पक्षियों के चित्र उत्कीर्ण होते थे। इन्हें ‘पंचमार्क’ सिक्के भी कहा जाता है।
❖ कुषाण शासकों के सोने एवं ताँबे के सिक्के मिताथल से प्राप्त हुए हैं। खोखराकोट, अचर, पहाड़पुर, मोहिंदगढ़ी, नारनौल, अग्रोहा, रेवाड़ी, सुघ, करनाल आदि स्थानों से अनेक मुद्राएँ प्राप्त हुई हैं। ये अधिकांश सिक्के ढालने के काम आते थे।
❖ हिसार व अग्रोहा के टीलों से उत्खनन में इंडो-ग्रीक सिक्के तथा पंचमार्क सिक्के प्राप्त हुए हैं।
❖ हिसार जिले में स्थित हांसी अभिलेख का संबंध चौहान वंश के शासक पृथ्वीराज द्वितीय से है। इस अभिलेख से ज्ञात होता है कि पृथ्वीराज द्वितीय ने मुस्लिम आक्रमण से बचाव के लिए हांसी को किलाबद्ध स्वरूप प्रदान किया था।
❖ पालम बावली अभिलेख पहला अभिलेख है जिसमें दिल्ली के आस-पास के क्षेत्र को हरियाणा क्षेत्र कहा गया है।
❖ हरियाणा शब्द की उत्पत्ति हरियाणक शब्द से होने का प्रमाण पालम बावली अभिलेख में मिलता है।
❖ यहाँ का एक इंडो सस्सानियन सिक्का कपिल मोहन से प्राप्त हुआ है।
❖ अग्रोहा, बरवाला और नारनौल से प्राप्त साँचों से पता चलता है कि यहाँ पर भी टकसाल होती थी।
❖ जगाधरी, करनाल, बुढ़िया तथा सुघ आदि स्थानों से कुषाणों के सिक्के प्राप्त हुए हैं।
❖ भिवानी जिले के मिताथल से समुद्रगुप्त का पशु प्रकार के सोने के सिक्के प्राप्त हुए हैं।
❖ पूर्व मध्यकालीन तोमर, प्रतिहार, चौहान आदि शासकों के सिक्के खोखराकोट, बुढ़िया एवं सुघ से प्राप्त हुए हैं।

❖ सुनैत (लुधियाना) से प्राप्त एक सिक्के पर ‘जयमंत्र’ अंकित है जो यौधेय शासक कार्तिकेय की सफलता की पुष्टि करता है।

(iii) मुद्रांक

❖ हरियाणा के नारनौल, राजा कर्ण का किला (कुरुक्षेत्र) अग्रोहा, खोखराकोट (रोहतक), सुघ, दौलतपुर (कुरुक्षेत्र), थानेसर आदि स्थानों से बड़ी मात्रा में मुद्रांक प्राप्त हुए हैं जिनमें से अधिकांश झज्जर के संग्रहालय में सुरक्षित हैं।

(iv) मूर्तियाँ

❖ हरियाणा में अधिकांश ब्राह्मण धर्म से संबंधित मूर्तियाँ प्राप्त हुई हैं।
❖ गुप्तकालीन मूर्तियों का प्रधान केन्द्र सुघ के आस-पास था।
❖ कुषाणकालीन मूर्तियों का प्रधान केन्द्र रोहतक के आस-पास का क्षेत्र था।
❖ बौद्ध एवं जैन मूर्तियाँ लगभग सम्पूर्ण हरियाणा से प्राप्त हुई हैं। इन मूर्तियों का निर्माण मोहिंदगढ़ी आदि अनेक स्थानों पर होता था।
❖ पूर्व मध्यकाल की मूर्तियाँ ज्यादातर तोमर व प्रतिहार शासकों से संबंधित हैं। ये मूर्तियाँ उत्तरी हरियाणा व सतकुम्भ (सोनीपत) से प्राप्त हुई हैं।
❖ राज्य से प्राप्त कुछ धार्मिक मूर्तियाँ रोहतक से बनी हैं।
❖ राज्य से प्राप्त गैर धार्मिक मूर्तियाँ अधिकांश पत्थर एवं रोहतक से बनी हुई हैं।

(v) स्मारक

❖ कुरुक्षेत्र के थानेसर में सम्राट हर्षवर्धन के महल तथा किले एवं राजा कर्ण के किले के अवशेष पाए गए हैं।

वास्तु अवशेष

अवशेषस्थान (जहाँ से प्राप्त हुए)
मोयनकालीन स्तूप व अवशेषहिसार व फतेहाबाद
हड़प्पा सभ्यता से पहले की सभ्यता के आभूषण एवं अवशेषकुणाल (फतेहाबाद)
हड़प्पाकालीन सभ्यता के अवशेषभिवानी
कुषाणकालीन सोने व ताँबे के सिक्केमिताथल (भिवानी)
इंडो-ग्रीक सिक्केखोखराकोट (रोहतक)
सोने तथा ताँबे के सिक्केमिताथल (भिवानी)
सिक्के ढालने के साँचेखोखराकोट, नारनौल
यौधेयकालीन साँचेखोखराकोट (रोहतक)
टकसालेंअग्रोहा, बरवाला, नारनौल
कुषाणकालीन सिक्केकरनाल, जगाधरी, बुढ़िया
समुद्रगुप्तकालीन सिक्केमिताथल
गुप्तकालीन मुद्राएँरोहतक
शुंगकालीन फलकसुघ (यमुनानगर)
हर्षकालीन ताम्र मुद्राएँसोनीपत
यौधेय गणराज्य की मुहरेंनारनौल (भिवानी)
जैन मूर्तियाँहांसी व रतनौता
कुषाण शैली का स्तंभरोहतक
यक्ष की मूर्तियाँपलवल
रामायण अंकित फलकनाचरखेड़ा (हिसार)
मिट्टी की मुहरेंदौलतपुर
अग्रेय जनपद के सिक्केअग्रोहा (हिसार)
बलराम की मूर्तिअस्थल बोहर (रोहतक)
गुर्जर-प्रतिहारकालीन अभिलेखपेहोवा

प्रागैतिहासिक काल

❖ हरियाणा से प्राप्त पुरावशेषों से उस क्षेत्र के विषय में जानकारी प्राप्त होती है।
❖ प्रागैतिहासिक काल को तीन कालों में विभाजित किया जाता है— 1. पुरापाषाण काल, 2. नवपाषाण काल तथा 3. ताम्रपाषाण काल।

पुरापाषाण काल

❖ इस चरण के पाषाण उपकरण पिंजौर, धामली, सुकेटड़ी, अहीरों, कालका के पास पपलीना, चण्डीगढ़, फिरोजपुर झिरका, कोटला आदि स्थलों से प्राप्त हुए हैं।
❖ ये उपकरण छोटे, गोल और चपटे पत्थरों के रूप में हैं। ऐसे उपकरण सोहन घाटी से भी प्राप्त हुए हैं।

❖ हरियाणा से प्राप्त हुए पुरापाषाणकालीन औजार मुख्यतः दो प्रकार (कोर तथा फ्लेक) के हैं।
❖ पुरापाषाण काल को तीन भागों में विभक्त किया गया है—

  1. निम्न पुरापाषाण काल (5,00,000 से 1,25,000 वर्ष पूर्व)
  2. मध्य पुरापाषाण काल (1,25,000 से 40,000 वर्ष पूर्व)
  3. उत्तर पुरापाषाण काल (40,000 से 10,000 वर्ष पूर्व)

❖ हरियाणा राज्य से प्राप्त निम्न पुरापाषाण काल के औजारों में कुल्हाड़ी, क्लीवर, पत्थर, खुरचने, गंडासे आदि प्रमुख हैं।
❖ मध्य पुरापाषाण काल के औजारों में खुरचने, गंडासे, वेधक, कुल्हाड़ी एवं सुजा प्रमुख हैं तथा उत्तर पुरापाषाण काल के औजारों में गंडासे, खुरचनी, कुल्हाड़ी तथा वेधक प्रमुख हैं।

❖ इस काल में हरियाणा के दो प्रमुख क्षेत्र हैं जहाँ से इस समय के साक्ष्य प्राप्त हुए हैं—
(i) अरावली क्षेत्र तथा
(ii) शिवालिक क्षेत्र।

❖ अरावली क्षेत्र में फीरोजपुर झिरका (मेवात) तथा कोटला (दिल्ली) महत्वपूर्ण क्षेत्र हैं।
❖ शिवालिक क्षेत्र में कालका, पिंजौर से इस काल के साक्ष्य मिले हैं।

❖ मध्य पाषाण काल के औजारों का आकार छोटा होता था, इसे लघु अश्म (माइक्रोलिथ) कहते हैं।
❖ गुड़गांव-फरीदाबाद क्षेत्र में पल्लियांगांव, सिरोही, हरसंपुर इत्यादि स्थानों पर मध्य पाषाण कालीन औजार तथा अन्य वस्तुएँ प्राप्त हुई हैं।

❖ राज्य से प्राप्त मध्य पाषाण युग के औजारों में गंडासे, वेधक, खुरचने, तराशनी तथा सुजा प्रमुख हैं।
❖ रोहतक के डॉ. मनमोहन शर्मा को कालका जिले के पिंजौर क्षेत्र से मध्य पाषाण युग के हल जैसी कोई चीज और खेती में प्रयुक्त होने वाले औजार प्राप्त हुए हैं।

2. नवपाषाण काल

❖ इस चरण की प्रमुख विशेषता यह थी कि मानव इस काल में कृषि करने लगा था।
❖ इसके साक्ष्य हिसार जिले के सीसवाल से प्राप्त होते हैं। अतः इस सभ्यता का नाम सीसवाल सभ्यता रखा गया।

3. ताम्रपाषाण काल

❖ हरियाणा में रोहतक एवं हिसार जिलों के कुछ भागों में ताम्रकालीन औजार मिले हैं।
❖ इसके अध्ययन से ज्ञात होता है कि विश्व एवं देश के अन्य क्षेत्रों के समीप हरियाणा के अनेक भागों में इस सभ्यता का विकास हुआ।

आद्य-ऐतिहासिक काल

❖ इसके अन्तर्गत सीसवाल संस्कृति और सिन्धु घाटी सभ्यता को शामिल किया जाता है। इस काल के पुरावशेष हरियाणा में पाए जाते हैं।

1. हाकड़ा संस्कृति

❖ राज्य में हाकड़ा संस्कृति का कालक्रम हड़प्पा सभ्यता से भी पूर्व का माना जाता है।
❖ हाकड़ा संस्कृति को आरम्भिक कृषक संस्कृति भी कहा जाता है।

❖ इस संस्कृति के साक्ष्य हाकड़ा (घग्घर) नदी के बहाव क्षेत्र से मिलने के कारण इसे हाकड़ा संस्कृति कहा जाता है।
❖ हरियाणा में हाकड़ा संस्कृति के साक्ष्य सर्वप्रथम कुणाल नामक पुरास्थल से प्राप्त हुए हैं।
❖ पाकिस्तान में घग्घर नदी को हाकड़ा नदी के नाम से पुकारा जाता है।

2. सीसवाल संस्कृति

❖ डॉ. सूरजभान के नेतृत्व में हिसार जिले के सीसवाल गाँव की खुदाई की गई। वर्ष 1968 में सीसवाल संस्कृति के अवशेष प्राप्त हुए।
❖ कृषि की प्रमुखता के कारण इस संस्कृति को कृषक संस्कृति (सभ्यता) भी कहा जाता है।
❖ सीसवाल से प्राप्त मृद्भांडों की पृष्ठभूमि लाल थी और इस पर श्वेत तथा काले रंग की पुताई की गई थी। कुछ मृद्भांड सलेटी रंग के भी प्राप्त हुए।
❖ सीसवाल से मिले बर्तन-भांड तथा कालीबंगा (राजस्थान) से मिली सामग्री में एकदम समानता है।

हरियाणा में सीसवाल संस्कृति से संबंधित स्थल
जिलास्थल
हिसारसीसवाल, सलिंगाबाद, शाहपुर, पाटन, सातरोड खुर्द, अलीपुर, खंड, सिरसा, दत्ता, पाली, राखीगढ़ी, पाली, सिंधवा
सिरसा/फतेहाबादबणी तलवाड़ा, ताख्तोली, चीन्हू, राणियां
भिवानीमिताथल, खरक, चांग, तिगड़ाना
गुरुग्राममुँकेला, अलक्का, बालमपुर, मुंडेरखा, पाड़ा लुहिंग, गोपालपुर, मर्मलिका
रेवाड़ीबावली, बावास, लोहटा
कैथलमोह, चेक्का, सिल्ला, पुंडरी, कलायत, जंडेरी
जींदनरवाना, बरसाना, खोखरी
करनालकुंजपुरा, निसिंग, टावर, बहोलो

❖ सीसवाल से बर्तन-भांडों के अलावा मिट्टी की चित्रित चूड़ियाँ, मणियाँ तथा ताँबे के हथियार भी गंडासे जैसी वस्तुएँ भी प्राप्त हुई हैं।
❖ हरियाणा में इस संस्कृति के अन्तर्गत कुल 29 स्थान आते हैं, जिन्हें तीन स्तरों (प्रारम्भिक सीसवाल संस्कृति, मध्य सीसवाल संस्कृति तथा अंतिम सीसवाल संस्कृति) में बांटा गया है।
❖ पुरातत्वविदों के अनुसार हरियाणा में कुल 13 प्रारम्भिक सीसवाल संस्कृति के स्थल हैं जिनमें 9 दृषद्वती नदी की घाटी में 2 यमुना नदी की घाटी में तथा 2 सरस्वती नदी की घाटी में हैं।
❖ मध्य सीसवाल संस्कृति के स्थलों की संख्या 20 है, जिनमें 12 दृषद्वती नदी की घाटी में, 5 यमुना नदी घाटी में तथा 2 सरस्वती नदी घाटी में हैं।
❖ राज्य में अंतिम सीसवाल संस्कृति के स्थलों की संख्या 28 (सर्वाधिक) है, जिनमें 11 सरस्वती नदी की घाटी में, 10 दृषद्वती नदी की घाटी में, 6 यमुना नदी की घाटी में तथा 1 सरस्वती नदी की घाटी में है।

❖ सीसवाल संस्कृति कृषि प्रधान थी। यह परवर्ती संस्कृतियों की तुलना में बहुत उन्नत थी। इसी समय में पशुओं का व्यवस्थित पालन शुरू हुआ था। इस संस्कृति में ही दूध का प्रचलन प्रारम्भ हुआ।
❖ इस संस्कृति के लोग ताँबे नामक धातु से परिचित थे।
❖ इस संस्कृति में देवी-देवताओं की मूर्तियों का निर्माण होने लगा था। विवाह का चलन सम्भवत: हो गया था।

3. सिन्धु घाटी सभ्यता

❖ 5000 वर्ष पुरानी सिन्धु घाटी सभ्यता वर्तमान में राज्य के हिसार जिले में मिलती है। इस सभ्यता को कांस्ययुगीन सभ्यता भी कहा जाता है।
❖ सिन्धु घाटी सभ्यता के इस राज्य में पाए गए क्षेत्रों में मिताथल (भिवानी) तथा बनावली (फतेहाबाद) प्रमुख हैं।
❖ मिताथल की खुदाई 1968 ई. में डॉ. सूरजभान के नेतृत्व में सम्पन्न हुआ।
❖ बनावली की खुदाई 1973–74 ई. में आर.एस. बिष्ट द्वारा की गई।
❖ बनावली में प्राचीन सरस्वती नदी की घाटी स्थित है।
❖ यहाँ से एक विचित्र पशु की मुहर प्राप्त हुई है, जिसका धड़ सिंह का है तथा सींग बैल के हैं।
❖ यहाँ पर प्राक-हड़प्पा तथा हड़प्पा सभ्यता के साक्ष्य मिले हैं।
❖ यहाँ से मिट्टी का खिलौना (हल) भी मिला है तथा सड़कों पर बैलगाड़ी के पहियों के निशान मिले हैं।
❖ यहाँ से काफी मात्रा में अन्नकोष के साक्ष्य मिले हैं।
❖ बनावली एकमात्र स्थल है, जहाँ से मातृदेवी की दो मूर्तियाँ मिली हैं।
❖ यहाँ से अग्निवेदियों के साक्ष्य भी मिले हैं।
❖ यहाँ से जल निकासी प्रणाली का अभाव मिला है जोकि सिन्धु घाटी की विशेषता है।
❖ वर्ष 2016 में भिवानी जिले के तिगड़ाना गाँव से प्राप्त अवशेषों से इसके महत्वपूर्ण औद्योगिक व व्यापारिक केंद्र होने की पुष्टि प्राप्त हुई है।
❖ हड़प्पा घाटी सभ्यता स्थलों में मिरजाना हरियाणा में सबसे प्राचीनतम स्थल है।
❖ राखीगढ़ी हड़प्पा सभ्यता (सिन्धु घाटी सभ्यता) स्थलों में सर्वाधिक विस्तृत है।
❖ यह हिसार जिले में दृषद्वती नदी के तट पर स्थित है।
❖ राखीगढ़ी की खुदाई डॉ. अमरेन्द्र नाथ द्वारा की गई। राखीगढ़ी से मानव खोपड़ी, घर, शवाधान तथा टेराकोटा उद्योग के साक्ष्य मिले हैं।
❖ इस उत्खनन में प्रारम्भिक एवं परिपक्व हड़प्पा के प्रमाण उपलब्ध हुए हैं।
❖ प्राचीन जोड़ों के नरकंकाल भारत के सबसे बड़े हड़प्पा स्थल राखीगढ़ी से प्राप्त हुए हैं।
❖ 26 मार्च 2014 को हरियाणा सरकार ने राखीगढ़ी को सिन्धु घाटी सभ्यता का सबसे बड़ा शहर होने का दावा किया।
❖ यह सभ्यता लगभग 7500 ई.पू. पुरानी है। निरंतर खुदाई से मिले सामान तथा कंकाल आदि के आधार पर अनुमान लगाया जा रहा है कि यह सभ्यता हड़प्पा काल से भी प्राचीन रही है।

❖ सिन्धु घाटी सभ्यता से जुड़े अन्य महत्वपूर्ण स्थानों में भगवानपुर (कुरुक्षेत्र), दौलतपुर (कुरुक्षेत्र), बालू (कैथल) इत्यादि प्रमुख हैं।
❖ फार्माणा खास (रोहतक) हरियाणा में ज्ञात पुरास्थलों में राखीगढ़ी के पश्चात यह दूसरा सबसे बड़ा पुरास्थल है।
❖ फार्माणा खास से उत्खनन से बनी चार हड़प्पाकालीन मोहरें एवं हड़प्पा सभ्यताकालीन कब्रिस्तान प्राप्त हुए हैं।

राज्य में सिन्धु घाटी सभ्यता के क्षेत्र
जिलातहसीलसंबंधित स्थल का नाम
कुरुक्षेत्रथानेसरभिर्मखेड़ी, राजा कर्ण का किला, बकाना, मलाड़ी, बौली, देवीदासपुर, गढ़ी रोहन, गढ़ी सरदाना, गुलाबगढ़, कलवा, कनोली, पिपली, थानेसर, पलवल
अंबालाअंबालारतनखेड़ी, मोहना, मुलाना, सामलेहड़ी, बोह
नारायणगढ़बहलोली, टंगेल, अंबेरी
यमुनानगरजगाधरीकोहंडाखान, सांड, माजरेटी, चंदोला
फतेहाबादफतेहाबादबनावली, बुर्जा
टोहाना
हिसारहिसारसिरसा, ताल, अलीपुर, खरड, धूर
हांसीराखी शाहपुर
जींदनरवानाकलायत
जींदखोखरी, जीवन खेड़ा, मलार खेड़ा, बरोड़ेरा
करनालकरनालनिसिंग, मोची, सांची, बहोल, पूजम
पानीपतपानीपतउडालना कला
सोनीपतगोहानाछपरा, घटवाल, मदिना, सुल्तानखेड़ा, रोहेला
भिवानीभिवानीगगराना, कच्छा, निनान, शामगढ़, झिंझोली, खड़ा, मिताथल, चांग
चरखी दादरीदादरीमिर्जी, झिंझोला
रोहतकरोहतकमाया, सिलाना, सिसाना, कंसाला, कसरोती
गुरुग्रामगुरुग्रामखंडेवाड़ा, भदसा
फीरोजपुर झिरकाबढ़ाई खेड़ा, पाड़ा, भटाव, खेड़ा मुंडेता
कैथलगुहलाचीका, कसौर, राखेड़ा, बदरपुर, खांडाखेड़ा, राखी, मलिकपुर, बनहेड़ा
कैथलबरसाना, खेड़ी, रायवाली, टिबौली, अरौड़, मुंड, पिपौली, जठेरी, पुथड़ी, उपलाना, सावंतखेड़ी, जोगीनी खेड़ा, दूध खेड़ा, धुराला दौलतपुर

❖ प्रारम्भिक हड़प्पा सभ्यता, हड़प्पा सभ्यता एवं उत्तर हड़प्पा सभ्यता के अवशेष भिवानी जिले में स्थित मिताथल गाँव से प्राप्त हुए हैं। फतेहाबाद की रतिया तहसील के स्थित पुरास्थल कुणाल से हाकड़ा संस्कृति, प्रारम्भिक हड़प्पा सभ्यता एवं हड़प्पा सभ्यताओं के प्रमाण मिले हैं।

❖ हरियाणा के कुरुक्षेत्र जिले में भगवानपुर गाँव ऋग्वैदिक कालीन सरस्वती नदी के किनारे स्थित है। 1975–77 के मध्य इस स्थान का उत्खनन प्रो. जी.पी. जोशी द्वारा करवाया गया।
❖ यहाँ से किए गए उत्खनन से उत्तर हड़प्पा संस्कृति तथा चित्रित धूसर मृद्भाण्ड के अवशेष प्राप्त हुए हैं।
❖ पुरास्थल दौलतपुर हरियाणा राज्य के कुरुक्षेत्र जिले के थानेसर में सरस्वती नदी के किनारे स्थित है।
❖ पुरास्थल बालू कैथल जिला से 20 किलोमीटर दूर दक्षिण में सरस्वती नदी के किनारे स्थित है। डॉ. सूरजभान तथा डॉ. जिम जी. शेफर (अमेरिका) ने 1977 ई. में इस स्थल की खोज की थी।

वैदिक काल

❖ सिन्धु घाटी सभ्यता के पश्चात भारत में जिस नवीन सभ्यता का विकास हुआ, उसे ही वैदिक सभ्यता के नाम से जाना जाता है।
❖ इस काल की जानकारी हमें मुख्यतः वेदों से प्राप्त होती है, जिसमें ऋग्वेद सबसे प्राचीन वेद है।
❖ विश्व के सबसे प्राचीन ग्रंथ ‘ऋग्वेद’ में हरियाणा शब्द का प्रयोग ‘राज हरियाणे’ के रूप में हुआ है।
❖ ऋग्वेद में ही हरियाणा का नाम ‘हरियाण’ है।
❖ वैदिक काल के अनुसार, हरियाणा भरत वंश की भूमि का इतिहास है।

❖ प्रसिद्ध इतिहासकार डॉ. एच.आर. गुप्ता व अन्य इतिहासकार हरियाणा शब्द का उद्गम आर्याना शब्द से हुआ मानते हैं।
❖ पुरातत्वविद् बी.बी. लाल ने आर्यों को चित्रित धूसर मृदभाण्डीय संस्कृति से जोड़ा है।
❖ हरियाणा में चित्रित धूसर मृदभाण्डीय संस्कृति के लगभग 300 स्थल हैं, जिनमें भगवानपुर, दौलतपुर, सुग्ध तथा राजा कर्ण का किला आदि प्रमुख हैं।
❖ वैदिक सभ्यता में आर्य लोग हरियाणा को ‘देवभूमि’ कहते थे।
❖ शर्याति के मृत्यु के पश्चात पुरावा सुद्युम्न का उत्तराधिकारी ने सतलुज से लेकर साहबी नदी के क्षेत्र पर अधिकार कर लिया क्योंकि शर्याति का कोई उत्तराधिकारी नहीं था।
❖ नाहुष के पश्चात ययाति राजा बना। इसके पाँच पुत्र क्रमशः: तुर्वस, अनु, पुरु, यदु और द्रुह थे।

1. ऋग्वैदिक काल (1500–1000 ई.पू.)

❖ ऋग्वैदिक काल में आर्यों तथा दासों के बीच संघर्ष का केंद्र सरस्वती नदी का तट था।
❖ आर्यों का प्रथम पराक्रमी राजा मनु वैवस्वत था। मनु के चार पुत्र इक्ष्वाकु, परशु, सुद्युम्न व शर्याति थे।
❖ इनमें से सुद्युम्न का कार्यक्षेत्र सरस्वती के ऊपर का क्षेत्र (जिनमें अंबाला–कुरुक्षेत्र आदि सम्मिलित थे) था और शर्याति के कार्यक्षेत्र की सीमा राजस्थान की सीमा तक थी।
❖ शर्याति ने अश्वमेध यज्ञ का आयोजन किया था, जिसके पुरोहित भार्गव ऋषि च्यवन थे, जो सम्भवत: नारनौल के निकट दोस्सी नामक स्थान से थे।

वैदिककालीन क्षेत्र
जिलेक्षेत्र
हिसारकौलंग, रत्ताखेला, उकलाना, बुर्ज, हांसी, पाली, सिरसा
सिरसाकढियाली, हुमायूंखेड़ा, बणी, नकुरा, रानियां
जींदटोहाना-धामसी, रता खेड़ा, रूपौली, कलायत, जींद, रीतोली कलां, राजौंद, मुढ़, बेरी खेड़ा, खाखड़ी, मलार खेड़ा
कुरुक्षेत्रसुल्तानपुर मगल, करसिंघा, चाचर, रतनखेड़ा, रामथली, कसौर, सरतौर, जोसरों, रजक, नकरौटी, लाडनी, शेरगढ़, मुंडखेड़ा, यमुनानगर, अजरई, ठानेश्वर, मोरथली, दौलतपुर, उराना, सरसामन, अमीन, धनौर, गोहाना, गढ़ी अहीरपुर, गढ़ी रोहन, हंसपाल, खरखदा, अरजईला, खंडी
करनालनिसिंग, असंध, सासम, पूजम, भोला
पानीपतपानीपत
सोनीपतसुमन, गुमर
रोहतकबलियाना, बहादुरगढ़, खरखड़ा, इस्माइला, गुमर, फरमाना, हुलसाना, कसोला, छपरा, नकोली
अंबालाबरसाना, ककरखेड़ी, सुघ, पावला, हरसौला, भीन, सफेद, महाबत नगर, कुरुक्षेत्र, कमाल, पथरौ
फरीदाबादबामणखेड़ा, बहोला, बलाई, असावरेखेड़ा, अहरोड़ा, गुदराना, सौंख, पलवल, बल्लभगढ़, तिलपत, सीही, खेड़ा, धौलपुर, लोढ़िया
गुरुग्रामहरोला खेड़ा, भदसा, धनपुर खेड़ा, औंधा, औछा, सिमर, बीरस, गुहाना, गोहाना, गांगोली, उजिना, मंडकौला, जयसिंहपुर, मलख, गुरुग्राम, धनकोट, माजरा सेहद, खेडकी

❖ पुरु के नाम पर ही इस क्षेत्र का नाम ‘पौरव’ पड़ा।
❖ महाभारत के अनुसार, कालान्तर में गंगा घाटी के पांचाल ने हरियाणा के पुरु राज्य पर आक्रमण कर दिया।
❖ संग्राम को राज्य छोड़ कर जाना पड़ा। तत्पश्चात पुरु राजा ने हिन्द-इन्द्रि सीमावर्ती प्रदेश में प्रबल हो रहे कुरुओं की सहायता से हरियाणा को पुनः प्राप्त किया।
❖ इसके पश्चात हरियाणा पर कुरुओं का शासन स्थापित हो गया।

2. उत्तर वैदिक काल

❖ उत्तर वैदिक काल में इस क्षेत्र में कुरु शासन की स्थापना की गई थी।
❖ वामन पुराण के अनुसार, राजा कुरु ने खेतवन में हल चलाकर कुरुक्षेत्र को बसाया।
❖ उत्तर वैदिक काल में हरियाणा में कुरु वंश का शासन था। इस वंश का संबंध दुष्यंत व शकुन्तला से बताया जाता है। इस वंश के प्रतापी शासक शांतनु थे। जिसके उत्तराधिकारी पाण्डव और कौरव थे।

❖ गांधारों ने कुरु सम्राट शांतनु के शासन के समय हरियाणा पर आक्रमण किया, शांतनु के पुत्र चित्रांगद ने उन्हें सरस्वती नदी तट पर रोका, जिससे दोनों के बीच युद्ध हुआ तथा इसमें चित्रांगद की मृत्यु हो गई।
❖ युद्ध के अन्त में कुरु विजयी रहे थे। यह कुरुक्षेत्र का प्रथम युद्ध था।
❖ इसी काल में कौरवों और पांडवों का प्रसिद्ध महाभारत युद्ध हुआ था, जो कुरुक्षेत्र में लड़ा गया था।
❖ इस युद्ध में पांडव विजयी रहे। यह युद्ध कुरुक्षेत्र की धरती पर कुल 18 दिन तक चला था।
❖ इस युद्ध में भगवान श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को कुरुक्षेत्र की भूमि पर महत्वपूर्ण उपदेश दिया गया, जिसे गीता का उपदेश नाम से जाना जाता है।
❖ इस युद्ध को ‘धर्मयुद्ध’ भी कहा जाता है।
❖ विश्व के सबसे बड़े महाकाव्य महाभारत के लेखक महर्षि वेदव्यास थे।
❖ महाकाव्य महाभारत को जयसंहिता और शतसाहस्री संहिता भी कहा जाता है।
❖ महाभारत के कुल 18 पर्व हैं; इसमें भीष्म पर्व (छठे पर्व) का भाग गीता है।
❖ सर्वप्रथम अवतारवाद का उल्लेख गीता में मिलता है।
❖ ‘भारतवर्ण’ नाम से प्रचलित महाभारत का तमिल भाषा में अनुवाद पेरुन्देवनार ने किया था जबकि बंगाल भाषा में अनुवाद अलाउद्दीन नुसरत शाह ने किया था।
❖ रज्मनामा नाम से महाभारत का फारसी में अनुवाद अबुल फजल ने किया था। इसकी प्रस्तावना अबुल फजल ने लिखी थी।
❖ उत्तर वैदिक काल में राजा परीक्षित ने हरियाणा तथा आस-पास के अपने क्षेत्र को तीन भागों में बांटा—

  1. कुरुक्षेत्र
  2. कुरुजन
  3. हस्तिनापुर

गणराज्यों का काल

❖ महाजनपद काल में 16 महाजनपदों का उल्लेख बौद्ध ग्रंथ ‘अंगुत्तर निकाय’ में मिलता है। इसमें से ‘कुरु’ महाजनपद हरियाणा में अवस्थित था। इसकी राजधानी इन्द्रप्रस्थ तथा हस्तिनापुर में थी।
❖ ‘कुरु’ महाजनपद का विस्तार हरियाणा से दिल्ली तथा मेरठ तक था।
❖ ‘हरियाणा’ में इस गणतंत्रीय व्यवस्था की स्थापना मौर्यों ने की।

मौर्य काल

❖ हरियाणा प्रदेश 324 से 232 ई.पू. तक मौर्यों के अधीन रहा था। मौर्य साम्राज्य का संस्थापक चन्द्रगुप्त मौर्य था।
❖ हरियाणा के मौर्य साम्राज्य में शामिल होने का उदाहरण टोपरा (अंबाला) में पाया गया अशोक का स्तम्भ लेख है। अशोक ने थानेसर में एक स्तूप भी बनवाया था, जिसमें महात्मा बुद्ध के अवशेष रखे गए थे।
❖ अशोक ने सरस्वती नदी के किनारे थानेसर, श्रुग्न और शेरिफिक (सिरसा) में बौद्ध विहारों का निर्माण कराया।

मौर्यकालीन अभिलेख

(i) टोपरा अभिलेख—इस अभिलेख का निर्माण मौर्य शासक अशोक ने करवाया था, जो खिजरी (जिला यमुनानगर) में स्थित है।

(ii) करनाल अभिलेख—इस अभिलेख को खरोष्ठी लिपि में लिखा गया है। यह एक प्रस्तर अभिलेख है जो अपूर्ण है क्योंकि इसमें लिखे गए कुछ अक्षरों को ही पढ़ा गया है।

(iii) सुघ अभिलेख—यह अभिलेख जगाधरी (यमुनानगर जिले में) में स्थित है। इस अभिलेख में एक बच्चे को तख्ती पर अनुस्वार एवं विसर्ग अक्षरों का लेखन करते हुए दिखाया गया है।

गणराज्यों ‘यौधेय, अग्र, अर्जुनायन, कुणिन्द’ का उदय

1. यौधेय गणराज्य

❖ यौधेयगण का आविर्भाव मौर्य वंश के बाद हुआ। युधिष्ठिर के बड़े पुत्र यौधेय ने यौधेयगण बनाया था।
❖ यौधेय गणराज्य में हरियाणा को बहुधान्य कहा जाता था।
❖ महाभारत के द्रोण पर्व में इसका उल्लेख है। हरियाणा के शक्तिशाली यौधेयगण का उल्लेख पाणिनि ने आयुधजीवी के रूप में किया है।
❖ इस उल्लेख में महर्षि पाणिनि के महाभाष्य व्याकरण ग्रंथ में इसकी चर्चा की गई है।
❖ जुनागढ़ के शिलालेख (150 ई.) में यौधेयगण का उल्लेख है।
❖ यौधेयगण के प्राचीन सिक्के 1834 ई. में कैप्टन कोटलें को सहारनपुर के निकट बेहट गाँव से तथा नोनियाखेड़ा सोनीपत से प्राप्त हुए।
❖ हांसी, खरखोदा, सिरसा, हिसार, रोहतक, सोनीपत, गुरुग्राम और करनाल से इसी तरह के सिक्के प्राप्त हुए हैं।
❖ यौधेय गणराज्य की राजधानी प्राचीनकालीन नगर (नौरंगाबाद-बावानी) थी, जबकि रोहतक तथा सिरसा किसी बड़े प्रशासनिक विभाग का मुख्यालय था।
❖ भिवानी जिले के नौरंगाबाद नामक स्थान से मिले सिक्कों पर ‘यौधेयानां बहुधान्य’ अंकित है तथा इसकी लिपि ब्राह्मी है।
❖ यौधेयों ने ‘यौधेयानां बहुधान्यके’ नामक सिक्के कुषाण शासक डेमेट्रियस पर विजय के उपलक्ष्य में चलाए थे।
❖ यौधेयों का प्रथम संघर्ष कुषाण शासक विमकडफिस से हुआ, जिसमें यौधेयों को हार हुई।
❖ विजयगढ़ के लेख से पता चलता है कि महाराज ही महासेनापति होता था। इनके कुछ सिक्कों पर ब्राह्मण देव अंकित हैं। यह शब्द कार्तिकेय का द्योतक है, जिन्हें यौधेय राष्ट्र का आराध्य देव माना जाता था।

2. अग्र गणराज्य

❖ अग्र गणराज्य का पुराना नाम अग्रदेश था। प्रसिद्ध बौद्ध ग्रंथ महावस्तु में अग्रोहा का प्राचीन नाम अग्रदेश मिलता है।

❖ बरवाला व अग्रोहा (हिसार) से प्राप्त साक्ष्य (सिक्के) बताते हैं कि हिसार में अग्र नामक गणराज्य था, जिसकी राजधानी अग्रोहा थी।
❖ इसका उल्लेख अध्याध्याय, बोधायन के सूत्र-सूत्र व पतंजलि के महाभाष्य में भी है।
❖ अग्रों से सम्बन्धित सर्वप्रथम 10 सिक्के मिले हैं, जिनमें 9 सिक्के बरवाला (हिसार) से रोजर्स को प्राप्त हुए, जो ब्रिटिश संग्रहालय में हैं, जबकि 1 सिक्का भारतीय संग्रहालय में है।
❖ राजस्थान आघाटी से अग्रों के 51 ताँबे के सिक्के एवं पंचमार्क सिक्के मिले हैं। इन सिक्कों पर सिंह, बैल, वृक्ष तथा घोड़े के चित्र अंकित हैं।
❖ सूर्य देवता की गुप्तकालीन मूर्ति अग्रोहा से ही प्राप्त होती है।
❖ अग्रोहा से ही संगीत के सात सुरों (सा, रे, गा, मा, पा, धा, नि) को दर्शाने वाली एक टेबलेट (ईंट) भी प्राप्त हुई है।
❖ कालान्तर में कुषाण युद्ध के बाद अग्रों का विलय यौधेय गणराज्य में हो गया। भारत की वैश्य जाति (वर्ण) अग्रोहा इस नगर को अपना उद्गम स्थान मानती है।

3. अर्जुनायन गणराज्य

❖ प्रसिद्ध विद्वान डॉ. काशी प्रसाद जायसवाल के अनुसार, लगभग 200 ई.पू. में अर्जुनायन गण का उदय हुआ, यह गण राजस्थान में स्थित था।
❖ डॉ. अनन्त अल्टेकर के मतानुसार, जिन मुद्राओं पर ‘इन्दु’ शब्द अंकित है, वे यौधेयों और अर्जुनायनों के विलय का द्योतक है।

4. कुणिन्द गणराज्य

❖ कुणिन्द गणराज्य प्राचीन भारत का एक महत्वपूर्ण गणराज्य था। कुणिन्द गणराज्य का क्षेत्र हरियाणा में अंबाला जिले के कुछ ऊपरी भाग में था।
❖ कुणिन्द गणराज्य की राजधानी हरियाणा का अंबाला था।
❖ पाणिनि ने अपने अष्टाध्यायी ग्रंथ में कुणिन्दों को कुलूत कहा है।
❖ कुणिन्दकालीन सिक्कों पर देवी लक्ष्मी तथा मृग के चित्र अंकित मिले हैं।
❖ सम्राट समुद्रगुप्त (राजा) व कार्तिकेय के सिक्के कुणिन्द शासक अमोघभूति के द्वारा चलाए गए थे।
❖ कुणिन्द शासकों को क्षत्रियपति भी कहा जाता था।
❖ अमोघभूति की मृत्यु के पश्चात कुणिन्द क्षेत्रों पर शक राजवंश का अधिकार हो गया।
❖ कुणिन्द गणराज्य के सिक्के करनाल तथा जगाधरी के बुढ़िया से मिले हैं।

मौर्योत्तर काल

❖ मौर्य के अन्तिम शासक बृहद्रथ की हत्या कर पुष्यमित्र शुंग ने 185 ई.पू. में शुंग वंश की सत्ता स्थापित की।
❖ हरियाणा के सुघ (यमुनानगर) से शुंगकालीन मूर्तियाँ प्राप्त हुई हैं।
❖ कुषाण शासक कनिष्क के सिक्के तथा कुषाणकालीन मूर्तियाँ मिताथल, रोहतक इत्यादि स्थानों से प्राप्त हुए हैं।

गुप्त काल

गुप्तकालीन अभिलेख

❖ गुप्त वंश की स्थापना ‘श्री गुप्त’ ने की थी जिसने महाराजा की उपाधि धारण की थी।
❖ प्रयाग प्रशस्ति से ज्ञात होता है कि गुप्त शासक समुद्रगुप्त ने यौधेय गणराज्य को गुप्त साम्राज्य में मिला लिया था।
❖ 5वीं सदी में गुप्त शासक स्कन्दगुप्त की मृत्यु के पश्चात हरियाणा राज्य (तिलकपुर जनपद) पर पुष्यभूति नामक एक गुप्त सामन्त ने अधिकार कर लिया।

गुप्तकालीन अभिलेख

❖ हिसार खेड़ा अभिलेख—यह अभिलेख हरियाणा के हिसार में स्थित है।
❖ तोशाम अभिलेख—यह अभिलेख हरियाणा के भिवानी जिले में स्थित है, जहाँ भगवान विष्णु के एक मंदिर और दो सरोवरों के निर्माण का वर्णन किया गया है।
❖ खारखड़ा अभिलेख—यह अभिलेख हरियाणा के जींद जिले में स्थित है जहाँ भगवान राम, माता सीता और लक्ष्मण को जंगल से बात करते दर्शाया गया है।
❖ लाडोस अभिलेख—यह अभिलेख लाडोस (हिंद-चीन) में स्थित है। इस अभिलेख में लाडोस के राजा महाराजाधिराज श्री देवका द्वारा कुरुक्षेत्र महातीर्थ की स्थापना का वर्णन किया गया है।
❖ मोहिंदगढ़ी अभिलेख—यह अभिलेख हरियाणा के झज्जर जिले में स्थित है।

पुष्यभूति काल

❖ पुष्यभूति वंश अथवा वर्धन वंश का संस्थापक पुष्यभूति था, जिसकी राजधानी स्थानेश्वर (थानेसर) थी। पुष्यभूति ने ‘परममहेश्वर’ की उपाधि ग्रहण की।
❖ पुष्यभूति वंश के अन्तर्गत हरियाणा के 6 शासक हुए थे— नरवर्धन, राज्यवर्धन I, आदित्यवर्धन, प्रभाकरवर्धन, राज्यवर्धन II तथा हर्षवर्धन।
❖ वर्धन साम्राज्य का सर्वाधिक शक्तिशाली शासक हर्षवर्धन था, जिसने अन्तिम रूप से हूणों व गौड़ शासक शशांक को पराजित किया था।
❖ स्थानेश्वर महादेव मंदिर का निर्माण पुष्यभूति ने थानेसर में करवाया था। इस मंदिर का पुनर्निर्माण मराठा प्रमुख सदाशिव राव द्वारा करवाया गया था।
❖ हर्ष के दरबारी कवि बाणभट्ट ने अपने ग्रंथ हर्षचरित में हर्षवर्धन के प्रथम पूर्वज का नाम पुष्यभूति बताया है।
❖ हर्ष के बांसखेड़ा ताम्रपत्र से ज्ञात होता है कि महाराजा नरवर्धन की पत्नी रानी वज्रिणी देवी से राज्यवर्धन प्रथम का जन्म हुआ था।
❖ पुष्यभूति वंश के प्रतापी शासक हर्षवर्धन 606 ई. में मात्र सोलह वर्ष की आयु की अवस्था में थानेसर की गद्दी पर बैठा।
❖ ह्वेनसांग 629 ई. में हर्षवर्धन के शासनकाल में भारत आया था। वह 635 ई. से 644 ई. तक थानेसर रहा था। उसने अपनी पुस्तक ‘सी-यू-की’ में थानेसर (कुरुक्षेत्र) का वर्णन किया था।

❖ हर्षवर्धन के विजय अभियान का अंतिम आक्रमण पूर्वी तट पर गंजाम (ओडिशा) पर हुआ और 643 ई. में इस क्षेत्र को थानेसर में शामिल कर लिया।
❖ चीनी यात्री ह्वेनसांग के अनुसार थानेसर में तीन संघाराम थे जिसमें सात सौ बौद्ध भिक्षु निवास करते थे।
❖ दिवाकर से प्रभावित होकर हर्ष ने हीनयान बौद्ध धर्म को अपनाया लेकिन बाद में ह्वेनसांग से प्रभावित होकर बौद्ध धर्म को अपनाया।
❖ 647 ई. में हर्षवर्धन की मृत्यु हो गई थी।
❖ हर्षवर्धन की मृत्यु के पश्चात हरियाणा में यदु व कुरु शक्तियों ने जन्म लिया। कुरुक्षेत्र में कुरु तथा दक्षिण-पश्चिमी हरियाणा में यदुओं का शासन था।

गुर्जर-प्रतिहार वंश

❖ वाक्पति के ग्वालियर से ज्ञात होता है कि हर्ष के मृत्यु के पश्चात आठवीं शताब्दी के प्रारम्भिक वर्षों में हरियाणा का क्षेत्र कन्नौज के राजा यशोवर्मन के अधिकार में आ गया था। लेकिन यह कुछ ही समय शासन कर पाया।
❖ राजा धर्मपाल को पराजित कर प्रतिहार शासक नागभट्ट द्वितीय ने हरियाणा पर अधिकार कर लिया। यह वत्सराज का पुत्र था।
❖ प्रतिहार शासक नागभट्ट द्वितीय (805–33 ई.) के समय हरियाणा उसके अधीन था। मिहिरभोज (836–85 ई.) के समय पेहोवा उत्तर भारत का बड़ा व्यापारिक केंद्र था। यहाँ घोड़ों का व्यापार होता था।
❖ प्रतिहार शासक महेन्द्रपाल प्रथम के पेहोवा शिलालेख से ज्ञात होता है कि तोमरों में ‘जजल्ल’ नामक पहला राजा था, उसी वंश में ‘जन्जुक’ नामक वीर था।

तोमर वंश

❖ महेन्द्रपाल के पेहोवा प्रशस्ति से ज्ञात होता है कि जजल्ल नामक सम्राट ने तोमर वंश की स्थापना की थी।
❖ 1631 ई. के एक शिलालेख में तोमर राजपूतों को सोमवंशी क्षत्रिय और पांडवों का वंशज कहा गया है।
❖ इनके शासकों की राजधानी ढिल्लिका थी। हर्ष नाथ द्वारा स्थापित एक शिलालेख से ज्ञात होता है कि चहमान शासक चन्द्र ने तोमर शासक पीलूपाल को पराजित कर करद की स्थिति प्राप्त कर ली थी।
❖ कुरुक्षेत्र के पेहोवा में विष्णु मंदिर का निर्माण तोमर कुमारों गंगा, पूर्णराज व देवपाल ने करवाया था।
❖ 11वीं सदी में सूरजकुंड (फरीदाबाद) का निर्माण अनंगपाल द्वितीय ने करवाया था।
❖ पुराणों से ज्ञात होता है कि आरम्भ में तोमरों का निवास हिमालय के निकट किसी उत्तरी प्रदेश में था किंतु 10वीं शताब्दी तक ये हरियाणा के करनाल तक पहुँच चुके थे।
❖ तोमर वंश चन्द्रवंशी होने का दावा करते थे। माना जाता है कि तोमर शासक परीक्षित के माध्यम से पांडव के वंशज थे।

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History of Haryana क्या है और Haryana GK में इसका क्या महत्व है?

History of Haryana राज्य के प्राचीन, मध्यकालीन और आधुनिक इतिहास को कवर करता है, जिसमें सिंधु घाटी सभ्यता से लेकर स्वतंत्रता संग्राम तक की घटनाएँ शामिल हैं। Haryana GK में यह विषय बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि प्रतियोगी परीक्षाओं में इससे जुड़े कई प्रश्न पूछे जाते हैं।

History of Haryana की शुरुआत कब से मानी जाती है?

History of Haryana की शुरुआत प्राचीन काल से मानी जाती है, जब यह क्षेत्र ब्रह्मावर्त और आर्यावर्त के नाम से जाना जाता था और वैदिक सभ्यता का प्रमुख केंद्र था।

Haryana GK में History of Haryana से जुड़े महत्वपूर्ण तथ्य कौन से हैं?

Haryana GK में History of Haryana से जुड़े महत्वपूर्ण तथ्यों में 1 नवंबर 1966 को राज्य का गठन, पानीपत की तीन लड़ाइयाँ, और वैदिक सभ्यता से जुड़ी ऐतिहासिक घटनाएँ शामिल हैं।

History of Haryana PDF नोट्स कहाँ से डाउनलोड करें?

आप History of Haryana और Haryana GK के PDF नोट्स www.hrgk.in से डाउनलोड कर सकते हैं, जहाँ प्राचीन से आधुनिक इतिहास तक की पूरी जानकारी उपलब्ध होती है।

प्रतियोगी परीक्षाओं में History of Haryana और Haryana GK क्यों जरूरी हैं?

History of Haryana और Haryana GK HSSC, CET, HPSC जैसी परीक्षाओं के लिए बेहद जरूरी हैं क्योंकि ये विषय राज्य से जुड़े बेसिक कॉन्सेप्ट और महत्वपूर्ण घटनाओं को कवर करते हैं, जो बार-बार पूछे जाते हैं।

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